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गुरुवार, अप्रैल 07, 2011

ऐसा भी क्‍या जीना जो मकड़ी ही बन गए



    जो मकड़ी की तरह जीते हैं वे ही परेशान और दु:खी रहते हैं। आपने देखा होगा मकड़ी स्‍वयं जाला बुनती है और स्‍वयं ही उसमें उलझी रहती है।     व्‍यक्ति भी स्‍वयं ही परिस्थितियों का जाला स्‍वयं बुनता है और फिर उसमें उलझता और निकलता रहता है, इसी ऊहोपोह में उसका जीवन दु:खी बना रहता है।
    प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपने भविष्‍य का निर्माता स्‍वयं है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो अस्‍वस्‍थ होते हुए भी रोग का बहाना बनाकर घर नहीं बैठते हैं और काम में संलग्‍न रहते हैं या अपना कष्‍ट भूलकर दूजों के हित में सक्रिय रहते हैं और ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो छींक आने पर या हल्‍का बुखार आ जाने पर कठिन रोग का बहाना बनाकर बिस्‍तर पर लेट जाते हैं और लम्‍बा आराम करते हैं।
    दु:ख, कष्‍ट या अभाव कभी भी पर‍िस्थितियों पर निर्भर नहीं करते हैं वह तो आपकी बुद्धि और आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करते हैं। जब तक आप अपने अन्‍त: में समाए इस अज्ञान (द़:ख परिस्थिति जन्‍य है) को नहीं छोड़ेंगे तब तक आप इससे मु‍क्‍त नहीं हो सकेंगे। जब आप अपने दृष्टिकोण का विस्‍तार करके संसार को देखने लगेंगे तो आप इस परिस्थिति जन्‍य दु:ख को पास ही नहीं आने देंगे, आपके पास आपकी हर समस्‍या का हल होगा। परिस्थितियां आपको उलझा कर मकड़ी बना ही नहीं पाएगी। फिर कोई भी यह नहीं कहेगा कि लो भई साहब तो हर समय अपने में ही उलझे रहते हैं, ऐसी भी क्‍या उलझन जो हर समय उसी में उलझे रहो, मकड़ी बने बैठे हैं। ऐसा भी क्‍या जीना जो मकड़ी ही बन गए। से नहीं मुक्‍त हो सकेंगे।
    मन में व्‍याप्‍त संकीर्णता और हीनता को त्‍याग करके जब आप विस्‍तृत दृष्टि से अपने आपसपास या संसार को देखते हुए सदाचार का पालन करेंगे तो मकड़ी नहीं बनेंगे और आपके समझ होगा परिस्थितियों से मुक्‍त ऐसा संसार कि सहसा आप कह उठेंगे कि दृष्टि क्‍या बदली सबकुछ ही बदल गया।

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