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रविवार, मार्च 06, 2011

25-समृद्ध कैसे बनें?


  
    प्रकृति स्‍वत: व्‍यय होकर दूजों को सम्‍पन्‍न करती है।
    प्रकृति स्‍वयं को शनै:-शनै: व्‍यय कर रही है जिसके प्रतिफल में सृजन हो रहा है अर्थात् सबको सम्‍पन्‍न कर रही है। प्रकृति से व्‍यय का पाठ सीखना चाहिए। आपको भी अपना शनै:-शनै: व्‍यय करना चाहिए। अपना व्‍यय करने से तात्‍पर्य यह है कि आप स्‍वयं की क्षमताओं, योग्‍यताओं एवं सम्‍भावनाओं का निवेश करें। यह निवेश(व्‍यय) सन्‍तुलित ढंग से हो, उसमें एक व्‍यवस्‍था हो, आंख बंद करके निवेश नहीं होना चाहिए और उस निवेश में एक पूर्णता होनी चाहिए। आपके पास देने के लिए धन नहीं है तो आप दूजों की प्रशंसा कर सकते हैं, उन्‍हें प्रेरणा दे सकते हैं। यह सब करेंगे तो यह भी एक प्रकार का निवेश(व्‍यय) है जो प्रतिफल में धन(प्राप्‍ति) अवश्‍य देगा। सेवा भी निवेश कर सकते हैं या दूजों की सहायता या उनको दिया गया सहयोग एक निवेश है, जो कभी भी आपकी वृद्धि हेतु किसी भी रूप में कुछ भी दे देगा। यह निवेश प्राइज़ की चाह रहित(निस्‍वार्थ या फल-प्राप्ति की चिन्‍ता के बिना) होकर करें। यदि आपने अपना निवेश निस्‍वार्थ भाव से करना सीख लिया तो समझ लें कि समृद्धि की राह आपने पा ली है और इस पर बढ्ना अपना विकास करना है। यह विकास समृद्धि का मार्ग ही प्रशस्‍त करेगा। (क्रमश:)
(आप समृद्धि के रहस्‍य से वंचित न रह जाएं इसलिए ज्‍योतिष निकेतन सन्‍देश पर प्रतिदिन आकर 'समृद्ध कैसे बनें' सीरीज के लेख पढ़ना न भूलें! ये लेख आपको सफलता का सूत्र दे सकते हैं, इस सूत्र के अनुपालन से आप समृद्ध बनने का सुपथ पा सकते हैं!)

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