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गुरुवार, मार्च 03, 2011

22-समृद्ध कैसे बनें?


   
    प्रकृति नकारात्‍मकता को स्‍वीकार नहीं करती है!
    प्रकृति का निरीक्षण करेंगे तो आपको यह ज्ञान-सूत्र प्राइज़ हो जाएगा कि प्रकृति के पास नकारात्‍मकता की कोई आवश्‍यकता नहीं है। प्रकृति का लक्ष्‍य सृजन में निहित है। वह सृजन में निरन्‍तर संलग्‍न है। यदि वह नकारात्‍मकता को प्रश्रय देती है तो आप जान लीजिए कि उसकी सृजन-शक्ति में अल्‍पता आने लगेगी और एक क्षण ऐसा भी आएगा जब वह सृजन कर पाने में असमर्थ हो जाएगी।     नकारात्‍मकता का प्रभाव सर्वाधिक पड़ता है। यह लक्ष्‍य की प्राप्ति में अवरोधक होती है। आप को भी नकारात्‍मकता को अस्‍वीकार कर देना चाहिए। इसके लिएऐसे वातावरण, मित्रों, सहायकों एवं उनसे दूर रहें जो नकारात्‍मक विचारों की बातें करते रहते हैं। यदि आपके अन्‍त: में नकारात्‍मकता आए तो स्‍वयं से कहें-इसका साथ आवश्‍यक नहीं, आगे बढ़ना है। ऐसा होने पर तुरन्‍त आप सकारात्‍मक विचारों को स्‍वीकार करना प्रारम्‍भ कर देंगे। नकारात्‍मकता से बचना ही समृद्ध बनने के मार्ग को प्रशस्‍त करना है। स्‍वयं को सकारात्‍मक विचारों के पोषक तत्त्‍वों से पोषित करके देखेंगे तो आपको विश्‍वास ही नहीं होगा, क्‍योंकि आप होने वाले परिवर्तनों के फलस्‍वरूप इतना समृद्ध हो चुके होंगे कि आप को अचंभित होना पड़ेगा। (क्रमश:)
(आप समृद्धि के रहस्‍य से वंचित न रह जाएं इसलिए ज्‍योतिष निकेतन सन्‍देश पर प्रतिदिन आकर 'समृद्ध कैसे बनें' सीरीज के लेख पढ़ना न भूलें! ये लेख आपको सफलता का सूत्र दे सकते हैं, इस सूत्र के अनुपालन से आप समृद्ध बनने का सुपथ पा सकते हैं!)

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