नए रूप रंग के साथ अपने प्रिय ब्‍लॉग पर आप सबका हार्दिक स्‍वागत है !

ताज़ा प्रविष्ठियां

संकल्प एवं स्वागत्

ज्योतिष निकेतन संदेश हिन्‍दी की मासिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित लेख इस ब्लॉग पर जीवन को सार्थक बनाने हेतु आपके लिए समर्पित हैं। आप इसके पाठक हैं, इसके लिए हम आपके आभारी रहेंगे। हमें विश्‍वास है कि आप सब ज्योतिष, हस्तरेखा, अंक ज्योतिष, वास्तु, अध्यात्म सन्देश, योग, तंत्र, राशिफल, स्वास्थ चर्चा, भाषा ज्ञान, पूजा, व्रत-पर्व विवेचन, बोधकथा, मनन सूत्र, वेद गंगाजल, अनुभूत ज्ञान सूत्र, कार्टून और बहुत कुछ सार्थक ज्ञान को पाने के लिए इस ब्‍लॉग पर आते हैं। ज्ञान ही सच्चा मित्र है और कठिन परिस्थितियों में से बाहर निकाल लेने में समर्थ है। अत: निरन्‍तर ब्‍लॉग पर आईए और अपनी टिप्‍पणी दीजिए। आपकी टिप्‍पणी ही हमारे परिश्रम का प्रतिफल है।

सोमवार, सितंबर 06, 2010

पहचान


एक बार राजकुमार बुद्ध अपने सेवक के साथ टहलने निकले। 
उन्‍हें माग मार्ग में एक दुर्बल व्‍यक्ति दिखाई दिया तो उन्‍होंने सेवक से पूछा-'यह दुर्बल क्‍यों है।' सेवक ने उत्‍तर दिया-'राजकुमार, यह व्‍यक्ति बीमार है।'
राजकुमार बुद्ध बोले-'तो क्‍या व्‍यक्ति बीमार भी होता है।'
 'हां राजकुमार, जब व्‍यक्ति अपनी शक्ति खो देता है तो बीमार हो जाता है।'
'मैं आज से ही बीमार हो गया।'-राजकुमार बुद्ध बोले।
थोड़ आगे चलने पर उन्‍होंने एक मुर्दे को देखा जिसके साथ कुछ लोग रोते चले जा रहे थे। यह देखकर वे सेवक से बोले-'ये लोग रो क्‍यों रहे हैं।'
सेवक राजकुमार की बात सुनकर बोला-'इनका कोई सम्‍बन्‍धी मर गया है।'
यह सुनकर राजकुमार बोले-' तो व्‍यक्ति मरता भी है।'
'हां, राजकुमार, एक न एक दिन व्‍यक्ति मर ही जाता है।' सेवक बोला।
सेवक की बात सुनकर बुद्ध बोले-'मैं आज से ही मर गया।'
उन्‍होंने उसी क्षण कहा-'मैं रोग, शोक और मृत्‍यु का कारण ढूंढना चाहता हूं।' ऐसा क्‍या हो गया जो उन्‍होंने ऐसा कहा। वास्‍तव में सेवक की बातें उनके हृदय को छू गयीं। उसी क्षण से उन्‍होंने अपनी पहचान खोजने का प्रयत्‍न किया। इस प्रयत्‍न में उनके भीतर सोई हुई शक्ति जाग उठी। सेवक के उत्‍तर सुनने से पूर्व बुद्ध केवल मनुष्‍य थे। परन्‍तु सेवक के शब्‍दों ने उनमें नई शक्ति का संचार किया और भीतर सोई शक्ति जाग गयी। तब उन्‍होंने ऐसा जीवन जिया जिसने लोगों का भला किया और वे महात्‍मा बुद्ध बन गए। जब मनुष्‍य अपने भीतर सोई शक्तियों को जगा लेता है, लेकिन ये जागती तब हैं जब वह स्‍वयं को पहचान लेता है। तब उसमें हीनता एवं छोटेपन की भावना नहीं रहती है। वह स्‍वयं की पहचान बनाने के लिए संघर्षरत् हो उठता है और इस संघर्ष में वे वह कर बैठता है जो उसे महान् बना देते हैं। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं वे सब तभी बने हैं जब उन्‍होंने स्‍वयं को पहचान लिया।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्‍पणी देकर अपने विचारों को अभिव्‍यक्‍त करें।

पत्राचार पाठ्यक्रम

ज्योतिष का पत्राचार पाठ्यक्रम

भारतीय ज्योतिष के एक वर्षीय पत्राचार पाठ्यक्रम में प्रवेश लेकर ज्योतिष सीखिए। आवेदन-पत्र एवं विस्तृत विवरणिका के लिए रु.50/- का मनीऑर्डर अपने पूर्ण नाम व पते के साथ भेजकर मंगा सकते हैं। सम्पर्कः डॉ. उमेश पुरी 'ज्ञानेश्वर' ज्योतिष निकेतन 1065/2, शास्त्री नगर, मेरठ-250 005
मोबाईल-09719103988, 01212765639, 01214050465 E-mail-jyotishniketan@gmail.com

पुराने अंक

ज्योतिष निकेतन सन्देश
(गूढ़ विद्याओं का गूढ़ार्थ बताने वाला हिन्दी मासिक)
स्टॉक में रहने तक मासिक पत्रिका के प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्‍ठ एवं सप्‍तम वर्ष के पुराने अंक 1920 पृष्ठ, सजिल्द, गूढ़ ज्ञान से परिपूर्ण और संग्रहणीय हैं। सातों पुस्तकें पत्र लिखकर मंगा सकते हैं। आप रू.1950/-का ड्राफ्‌ट या मनीऑर्डर डॉ.उमेश पुरी के नाम से बनवाकर ज्‍योतिष निकेतन, 1065, सेक्‍टर 2, शास्‍त्री नगर, मेरठ-250005 के पते पर भेजें अथवा उपर्युक्त राशि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अकाउंट नं. 32227703588 डॉ. उमेश पुरी के नाम में जमा करा सकते हैं। पुस्तकें रजिस्टर्ड पार्सल से भेज दी जाएंगी। किसी अन्य जानकारी के लिए नीचे लिखे फोन नं. पर संपर्क करें।
ज्‍योतिष निकेतन, मेरठ
0121-2765639, 4050465 मोबाईल: 09719103988

विज्ञापन