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रविवार, जून 06, 2010

तनाव मनोरोगी बनाता है! -डॉ. सत्येन्द्र तोमर, बी.ए.एम.एस, एम.डी.



    आपके प्रत्येक दिन में तनाव की महत्वपूर्ण भूमिका है। भागमभाग के इस जीवन में तनाव ने अपनी जगह बना 70 प्रतिशत लोग मनोरोग से पीड़ित हैं जिसका मूल कारण सदैव तनाव में रहना है। मनोरोगियों में महिलाओं की संख्या अधिक है। इस रोग का मुख्य कारण पर्यावरण, रहन-सहन और खान-पान के साथ सदैव तनाव में रहना है। ये सब धीरे-धीरे मनुष्य को मनोरोगी बना देते हैं। 
मनोरोग के कारण
    सब व्यस्त हैं और समय के अभाव से ग्रस्त हैं। इसीलिए दिनचर्या अनियमित हो जाती है। 
    अकेलापन अर्थात्‌ सदैव एकांगी जीवन जीना।
    दूषित पर्यावरण भी इसके पार्श्व में है।
    पति-पत्नी में तनाव की स्थिति या तलाक की नौबत।
    दीर्घायु तक विवाह न करना।
    माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा उपेक्षा। 
मनोरोग में होता क्या है?
     मनोरोगी किसी विशेष मुद्दे को लक्ष्य बनाकर रखते हैं और हर वक्त उसी में उलझे रहते हैं।
    महिलाएं इसलिए अधिक हैं कि 35-40 की आयु की अनेक लड़कियां मिल जाएंगी जो अविवाहित हैं और अकेले जीवन जी रही हैं क्योंकि नौकरी करती हैं और बाहर रहती हैं। वे विवाह भी माता-पिता की इच्छा के विपरीत करना ही नहीं चाहती हैं।
     मूलतः व्यक्ति सामाजिक प्राणी है। प्रत्येक को सहारे की आवश्यकता है। अकेलेपन के साथ जीवन जीने वाले लोग कुण्ठाग्रस्त हो जाते हैं और उनमें अधोलिखित लक्षण दिखाई देने लगते हैं-सदैव कुंठित रहते हैं। प्रसन्नता या आमोद या प्रमोद उन्हें भाता ही नहीं है। किसी न किसी बात को लेकर चिन्ता ग्रस्त रहते हैं। समस्याएं सदैव उनके साथ होती हैं और उनको लेकर वे सदैव चिन्तित रहते हैं। कुल मिलाकर वे अधिक चिन्ता करते हैं।
     इन सब बातों से शारीरिक क्रियाएं असन्तुलित हो जाती हैं। स्त्रियों में मासिक धर्म अनियमित हो जाता है। ये सब लक्षण धीरे- धीरे बीमार बना देते हैं। अनेक लोग तो इतने परेशान हो उठते हैं कि वे अपराध का सहारा ले बैठते हैं और हत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठते हैं या आत्महत्या की प्रवृत्ति उनमें दिखने लगती है। वर्ग विशेष से घृणा करने लगते हैं। ऐसा प्रेम प्रसंग में असफल होने के कारण अधिक होता है। शरीर बेडोल हो जाता है। भूख खत्म हो जाती है। नशे की लत पड़ जाती है। आलस्य घेरे रहता है। एकान्त अधिक पसन्द आता है। कुछ व्यक्ति तो अप्राकृतिक मैथुन का सहारा लेने लगते हैं। स्वभाव से उग्र, क्रूर एवं जिद्दी व क्रोधी हो जाते हैं। उनके बाल झड़ने लगते हैं। त्वचा कांति रहित हो उठती है। 
निदान
   मनोरोगियों को दवा से अधिक प्रेम की आवश्यकता होती है। ऐसे में मानसिक शान्ति के साथ स्नायु मंडल को बल प्रदान करने वाली औषधियां अधिक लाभप्रद होती हैं। भोजन में फल, हरी सब्जी, दही, दूध व प्रातः हरी घास में टहलना, खाली न बैठना एवं मनोरंजन भी करते रहना, सकारात्मक विचार या साहित्य को पढ़ना लाभप्रद है। विशेष परिस्थिति में अपने चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।

2 टिप्‍पणियां:

  1. शानदार और उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करने के लिये साधुवाद एवं शुभकामनाएँ। यदि आप चाहते हैं या आपको आपत्ति नहीं हो तो आपके ब्लॉग पर उपलब्ध सामग्री को हम १७ राज्यों के पाठकों तक पहुँचा सकते हैं। प्रेसपालिका पाक्षिक समाचार-पत्र के पाठकों को भी इसका लाभ होगा, लेकिन कृपया पारिश्रमिक की आशा नहीं करें।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, या सरकार या अन्य बाहरी किसी भी व्यक्ति से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३०९ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८) मो. ०९८२८५-०२६६६E E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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