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शनिवार, जून 05, 2010

योग विचार-पं. सत्यज्ञ




     आप जान लें कि दो या दो से अधिक ग्रह जब किसी राशि में साथ-साथ या किसी निश्चित अन्तर पर रहते हैं तो एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। ग्रहों की इस स्थिति को योग कहते हैं।
फलित ज्योतिष में योग की महत्ता
 योग नवग्रह, बारह राशि, बारह भाव पर आधारित है। दो या दो ग्रहों की युति, दृष्टि या स्थान भेद से परस्पर संबंध हो तो एक योग का जन्म होता है। योग कारक ग्रहों का फलित में विशेष महत्व है। योग के कारक ग्रह अपनी दशान्तर्दशा में फल करते हैं। योग का फल ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करता है। भाव, भावेश एवं उस ग्रह का बल या उस पर अन्य ग्रहों का प्रभाव या संबंध उसके फल को प्रभावित करता है। योग शुभ या अशुभ किसी प्रकार के भी हो सकते हैं।
यदि कुण्डली में शुभ या अशुभ दोनों प्रकार के योग हों तो जातक को दोनों प्रकार के फल की प्राप्ति होती है। यह अवश्य है कि फल योगकारक ग्रहों की दशान्तर्दशा में घटित होता है। 
समस्त कुंडलियों में दिखने वाले योग
 प्रायः सूर्य और चन्द्र से बनने वाले योग और पंचमहाभूत योग जिनके नाम वाशि योग, वेशि योग, उभयचारी योग, सुनफा योग, अनफा योग, दुरुधरा योग, केमद्रुम योग, बुधादित्य योग, रुचक योग, भद्र योग, हंस योग, मालव्य योग, शश योग, गजकेसरी योग और चन्द्र व मंगल योग। 
योग केन्द्र या त्रिकोण के अतिरिक्त अन्य अशुभ भाव से बने तो जातक को शुभ होते हुए भी फल नहीं मिलता है। कई बार योग कारक ग्रहों की दशा नहीं आती है तो भी फल नहीं मिलता है। 
गजकेसरी योग
 प्रायः यह योग गुरु व चन्द्र से बनता है। ये दोनों ग्रह परस्पर एक दूसरे से 1, 4, 7, 10 वें भाव में हों तो यह योग बनता है। यह योग शुभ व राजयोग कारक है। यह मान सम्मान व धन की प्राप्ति कराता है। जातक का यश भी बढ़ता है और अधिकार भी मिलता है। 
गज से तात्पर्य हाथी है और केसरी से तात्पर्य राजा से है। राजा हाथी पर सवार है। यह सम्पन्नता एवं राजसी ठाठ बाट का प्रतीक है। कई बार इस योग का फल नहीं मिलता है। इसका कारण गुरु व चन्द्र की दशा का न आना या इनका संबंध पापग्रहों से या अशुभ भावों से होता है, तब भी इसका फल शुभ की अपेक्षा अशुभ होता है। गजकेसरी योग का फल तभी होता है जब यह योग हर प्रकार से दोष रहित हो।
दरिद्र योग क्या है?
 प्रायः दरिद्र योग जिस जातक की कुंडली में रहता है वह करोड़पति के घर में जन्म लेकर भी दरिद्र रहता है। यह जान लें कि लक्ष्मी उससे रूठ जाती है।
वह सोने को हाथ लगाता है तो वह मिट्टी हो जाता है। धीरे-धीरे उसका समस्त धन समात हो जाता है और वह कंगाल होकर दरिद्रता का जीवन जीने लगता है।  कुछ दरिद्र योग इस प्रकार हैं-
1. लग्न या चन्द्र राशि से केन्द्र स्थान खाली हों या इन चारों में पापग्रह स्थित हों तो जातक दरिद्र होता है।
2. चन्द्र सूर्य  की युति हो और उस पर नीच ग्रह की दृष्टि पड़ती हो या वह पापग्रहों से पीड़ित हो तो जातक निर्धन या दरिद्र होता है।
3. चन्द्र राहु की युति हो एवं उस पर पापग्रह की दृष्टि पड़ती हो तो जातक दरिद्र होता है। 
4. चन्द्र नीच राशि में होया शत्रु ग्रह से दृष्ट हो या शत्राु ग्रह के साथ हो तो जातक निर्धन या दरिद्र होता है। 
5. नीच राशि में स्थित चन्द्र या शत्रु क्षेत्री चन्द्र लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में हो और उससे छठे, आठवें या ग्यारहवें भव में गुरु हो तो जातक निर्धन होता है।
6. लग्नेश द्वादश भाव में हो एवं द्वादशेश लग्न में हो तथा किसी एक के साथ सप्तमेश की युति हो या सप्तमेश उसे देख रहा हो तो जातक निर्धन या दरिद्र होता है।
7. चन्द्र दूसरे या सातवें भाव में हो, लग्नेश छठे भाव में हो और षष्ठेश लग्न में हो तो जातक निर्धन होता है।
8. पंचमेश षष्ठेश, अष्टमेश या द्वादशेश  के साथ हो, नवम में शनि हो व पापग्रह से दृष्ट हो तो जातक निर्धन होता है। 
9. गुरु राहु व केतु से युति करता है तो चांडाल योग होता है। इस योग में उत्पन्न जातक भाग्यहीन, मंदबुद्धि, आजीविका से असन्तुष्ट व शरीर पर घाव का निशान लिए होता है।
योग कैसे भी हों उनका फल करते समय कारक ग्रहों व भावों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। गोचर ग्रहों, दशान्तर्दशा एवं प्रत्यन्तर का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 
    यह जान लें कि योग कारक ग्रह सत्ता या गद्दी देते भी हैं और समय आने पर वापस छीन भी लेते हैं।

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