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सोमवार, जून 07, 2010

बुध की उत्पत्ति -पं. सत्यज्ञ


अत्रि ऋषि के वंशज बुध की उत्पत्ति मगध देश में धनिष्ठा नक्षत्र युक्त द्वादशी को हुई। यह पीत वर्ण व वैश्य जाति का है और पीले वस्त्र पहनता है। अत्रि ऋषि के पुत्र चन्द्र ने एक बार देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा का अपहरण कर लिया था। इससे देवासुर संग्राम हो गया। अन्त में ब्रह्मा जी ने बीच में पड़कर तारा को उन्हें वापिस दिला दिया। बृहस्पति ने तारा को गर्भवती पाया। उन्होंने अपने क्षेत्र में दूसरे का बीज देखकर तारा को गर्भस्राव करने की आज्ञा दी। तारा ने एक सुनहले अणु को गर्भ से बाहर निकाला जिससे एक बालक का जन्म हुआ। वह अति सुंदर था। उसे देख चन्द्र व गुरु दोनों मोहित हो गए।  तारा लल्जा वश कुछ न कह सकी तो बालक ने सत्य बोलने को विवश किया। उसकी बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर ब्रह्मा जी ने उसका नाम  बुध रखकर यह वरदान दिया कि यह सदैव बुद्धिदाता रहेगा। बालक को चन्द्रमा को दे दिया गया तो वे चन्द्र पुत्र कहलाए। उनकी प्रेरणा से अथर्ववेद प्रसिद्ध हुआ जिसमें अर्थशास्त्र, गणित व विज्ञान, कला, व्यापार के सूक्त थे। इसीलिए इनका संबंध व्यापार से हो गया।
बुध सौम्य व शुभ ग्रह कहलाया। बृहस्पति, चन्द्र व तारा तीनों के मिश्रण का स्वरूप है। इनके रंग क्रमशः पीला, सफेद व लाल थे और इनका मिश्रण से दूर्वादल श्याम हरा रंग बना। इसमें तीनों प्रवृत्ति वात, पित्त व कफ पायी जाती हैं। बृहस्पति का क्षेत्र और चन्द्र का वीर्य होने से यह दोनों से शत्रुता रखने वाला ग्रह बना। अन्य क्षेत्र में उत्पन्न होने के कारण वर्णसंकर अर्थात्‌ नपुंसक ग्रह कहलाया।
बुध ग्रह सूर्य का अति समीपस्थ ग्रह है। यह ग्रहों में सबसे छोटा ग्रह है। यह सूर्य से 27अंश से अधिक दूर कभी नहीं जाता। चन्द्र की तरह बुध की कलाओं में भी क्षय व वृद्धि होती रहती है। यह एक वर्ष में छह बार उदित व अस्त होता है। यह सूर्य से 27अंश की दूरी से आगे जाने पर वक्री हो जाता है। यह जिस राशि पर वक्री होता है उस राशि पर 25दिन ही रह पाता है। सूर्य की गति से भी तीव्र गति वाला होने के कारण यह पूर्व में अस्त व पश्चिम में उदय होता है और जब वक्री होता है तब पश्चिम में अस्त व पूर्व में उदय होता है। वक्री स्थिति में यह सूर्य से 12अंश दूर रहने पर तथा मार्गी होने पर 13अंश पर अस्त हो जाता है। यह 92 दिन मार्गी और 23दिन वक्री रहता है। बुध वक्री होने पर एक दिन आगे या पीछे स्थिर सा प्रतिभासित होता है।
महाभारत की एक कथानुसार इनकी बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर महाराज मनु ने अपनी गुणवती कन्या इला का इनके साथ विवाह कर दिया। इला और बुध के संयोग से महाराज पुरुरवा की उत्पत्ति हुई और बुध के वंश का विस्तार हो गया। 
बुध ग्रह के अधिदेवता और प्रत्यधिदेवता भगवान्‌ विष्णु हैं। यह द्वादश राशियों में मिथुन व कन्या राशि का स्वामी है। बुधाष्टमी के व्रत से बुध शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। इसके विंशोत्तरी दशा वर्ष 17 हैं। राजकुमार बुध स्वयं तो सिंह पर सवार रहता है। लेकिन इसके रथ में रंग-बिरंगे दस अश्व जुते रहते हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं-श्वेत, पिसंग, सारंग, नील, पीत, विलोहित, कृष्ण, हरित, वृष और पुष्पि है। बुध पीले रंग की पुष्प माला और पीला पीतांबर धारण करते हैं। उनके शरीर की कांति कनेर के पुष्प जैसी है। बुध चतुर्भुज है, वे चारों हाथों में क्रमशः तलवार, ढाल, गदा और वर मुद्रा धारण किए रहते हैं। वे सिर पर सोने का मुकुट तथा गले में सुंदर माला धारण करते हैं। बुध की प्रिय वस्तुएं मूंग, स्वर्ण, कांसा,  हरा वस्त्र, दिशा ईशान्य, मगध, जप संख्या 9000 है। इसका वैदिक मन्त्र इस प्रकार है जो यजुर्वेद 18/61 में वर्णित है-
ऊँ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्ठापूर्ते स द्भ सृजेथामयं च।
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्‌ विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत्‌॥ 
अर्थात्‌ हे अग्ने(ग्रह) तुम जागो। तुम बुद्धिमान होकर इस अभीष्ट पूर्ति वाले कर्म में यजमान से सुसंगत होओ। हे विश्वदेव निमित्त कर्म करने वाला यह यजमान देवताओं के साथ रहने योग्य होता हुआ श्रेष्ठ स्वर्ग से चिरकाल तक रहे।
इसका बीज मन्त्रा इस प्रकार है-ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाये नमः।
एकादशी का व्रत करें व साधुओं को हरे फल दान करें।             
बुधवार व्रत कथा व बुधवार का व्रत करना भी लाभदायी है। 
विष्णु पूजन व विष्णु सहस्त्रा नाम का पाठ करना भी लाभदायी है। बुधवार को यम की पूजा करना भी लाभदायक है। बुधवार को गणपति दर्शन करके दूध चढ़ाने से भी बुध प्रसन्न होते हैं। 


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