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गुरुवार, मई 13, 2010

धैर्य-ज्ञानेश्वर



एक बार की बात है कि एक चासनी के कढ़ाव के पास एक मक्खी उड़ रही थी। मक्खी ने सोचा कढ़ाव में बहुत सारी चासनी है, क्यों न इसे चट कर जाऊं। यह सोचकर वह कढ़ाव में बिना सोचे-समझे आतुर मक्खी कूद पड़ती है। फलतः अपने पर और पैर चासनी में लपेटकर उस जंजाल में लिपटकर बेमौत मर जाती है।

इसके विपरीत दूसरी ओर समझदार मक्खी कढ़ाव के किनारे बैठकर धीरे-धीरे स्वाद लेती, पेट भरती है और उन्मुक्त आकाश में बेखटके बिचरती है।

अधीर आतुरता ही मनुष्य को कुछ पाने के लिए उत्तेजित करती है और उतने समय तक ठहरने नहीं देती जिसमें उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति सरलतापूर्वक हो सके। धैर्यहीन जन सफल नहीं हो पाते हैं क्योंकि वे अधीरता के कारण दूरदर्शिता खो बैठते हैं और मक्खी की तरह असफल हो जाते हैं और कठिन परिस्थिति में फंस जाते हैं। अतः धैर्य सहित सोचविचार कर कार्यानुरूप साधन जुटाते हुए प्रयास करेंगे तो कोई भी शक्ति सफल होने से नहीं रोक पाएगी। सब कुछ समयानुरूप और सही ढंग से होगा। फलतः परिणाम सकारात्मक होगा और जीवन में उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा। धैर्यहीन जन अन्ततः असफल ही होते हैं और कठिन परिस्थिति में फंस जाते हैं।(मेरे द्वारा सम्पादित ज्योतिष निकेतन सन्देश अंक ६२ से साभार। सदस्य बनने या नमूना प्रति प्राप्त करने के लिए अपना पता मेरे ईमेल पर भेजें ताजा अंक प्रेषित कर दिया जाएगा।)

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