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शनिवार, मई 01, 2010

वास्तु द्वारा सकारात्मक ऊर्जा -ईश्वर पुर्सनाणी



आजकल घर बनाते समय वास्तु नियमों का ध्यान गृहस्वामी, कारीगरों, बिल्डरों एवं इंजीनियरों द्वारा रखा जाता है।  शतप्रतिशत वास्तु नियमों का पालन नहीं हो पाता है। लेकिन कुछ वास्तु नियमों को ध्यान में रखा जाए तो घर में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है। प्रत्येक को गृह में दिशाओं के अनुकूल कुछ नियमों का अनुसरण करना चाहिए जिससे सकारात्मक ऊर्जा का विकास हो सके। मूलतः वास्तु नियमों का ध्यान रखा जाए तो ये स्वतः विकसित हो जाती है और घर में धन, सुख व समृद्धि का वास होने लगता है।

सर्वोत्तम दिशाएं हैं!
यह जान लें कि उत्तर, पूर्व एवं उत्तर-पूर्व(ईशान) अत्यन्त महत्वपूर्ण दिशाएं हैं। ये उन्नतिकारक व देव दिशाएं हैं। धनकारक हैं। अतः इन दिशाओं में पूर्ण स्वच्छता रखी जाए, गन्दगी का नामोनिशान न हो एवं अस्त-व्यस्तता न हो। ये दिशाएं हल्की, साफ एवं खुली होनी चाहिएं। यह स्थान पूजा एवं अध्ययन कक्ष के लिए सर्वोत्तम है। 
स्वच्छता परमावश्यक है!
स्वच्छता का विशेष ध्यान घर में होना चाहिए। रहने का स्थान हो या व्यापार का स्थान हो, वहां स्वच्छता आवश्यक है।  पूर्वकथित तीनों दिशाओं में तो अवश्य होनी चाहिए क्योंकि ये दिशाएं उन्नति, समृद्धि एवं धनकारक होती हैं। ये दिशाएं स्वच्छता, हल्का एवं खुलापन पसन्द करती हैं। ये यदि इनमें है तो आप उन्नतिकारक जीवन जीएंगे। 
अग्नि की स्थापना करें!
दक्षिण, दक्षिण-पूर्व दिशाएं अग्नि स्थान है। अतः इनमें रसोई, गैसादि अग्नि का स्थान होना चाहिए। अग्नि स्थापन के लिए यह दिशा सर्वोत्तम है। 
जल की स्थापना करें!
उत्तर, पूर्व एवं उत्तर-पूर्व दिशा जल का सर्वोत्तम स्थान है। इन दिशाओं में खुलापन एवं जल की स्थापना अवश्य करनी चाहिए। आकाश तत्त्व की स्थापना के लिए भी यह सर्वोत्तम स्थान है।   
प्रेममयी वातावरण एवं नियमित पूजा आवश्यक है!
कहते हैं कि जहां प्रेम व एकता है, वहां सम्पदा है। जहां कलह है वहां लक्ष्मी नहीं टिकती है। 
वास्तुशास्त्र में ऊर्जा-स्रोत, आभा मंडल अर्थात्‌ औरा का उल्लेख होता है। इसे सरल भाषा में तेज भी कहते हैं। 
संसार में प्रत्येक वस्तु और चेतन प्राणियों का आभा-मंडल होता है। 
आभा-मंडल से वस्तु या व्यक्ति विशेष की सकारात्मकता एवं नकारात्मकता की मात्रा और तीव्रता का भान होता है। 
प्राचीन काल में साधु, सन्त एवं ऋषियों की सकारात्मकता उनके आभा-मंडल के कारण उनके आश्रम में एवं उसके आसपास मीलों तक उसका प्रभाव रहता था। इसीलिए उस समय दूर-दूर तक चहुं ओर सुगंधित एवं प्रेममय प्रभाव रहता था, इसीकारण बाघ बकरी तक एक साथ रहते थे और साथ-साथ खाते-पीते थे।  
इसी सकारात्मक ऊर्जा को निज घर में भी विकसित कर सकते हैं। परिवार के सभी सदस्य ब्रह्ममूहुर्त्त में उठकर नियमित पूजा-पाठ व मन्त्रों का उच्चारण, हवन आदि करें तो इससे सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि हो जाती है। फलस्वरूप गृह में सुख-समृद्धि का वास होने लगता है।
तुलसी स्थापना करें!
गृह में उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा में तुलसी की स्थापना अवश्य करें। तुलसी का पौधा घर में सकारात्मक ऊर्जा की रचना करता है। इससे गृह में सुख, सम्पन्नता, शान्ति एवं हर्ष के साथ-साथ उमंग की वृद्धि होती है।
वस्तुतः कुछ वास्तु नियमों के पालन करने से और पूजा-पाठ से सकारात्मक ऊर्जा घर में उत्पन्न करके गृह को          सुख-समृद्धि कारक बनाया जा सकता है।
आप वास्तु सम्मत भवन बनाने के लिए वास्तु-सलाह अवश्य लें क्योंकि जीवन में जो चाह आपकी है उसमें पूर्णता तभी आएगी जब आप समुचित ढंग से उसके लिए सक्रिय होंगे। वास्तु इस दिशा में सहयोगी का कार्य निभाता है।
वास्तु का मुख्य लक्ष्य गृह में सकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि करना है। 
यह वास्तु नियमों के पालन एवं पूजा-पाठ से आसानी से हो जाता है। 
अतः प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि सकारात्मक ऊर्जा को प्रश्रय दे और नकारात्मक ऊर्जा से दूर रहे। सकारात्मकता जीवन में उन्नति लाती है और सकारात्मक विचार से इसे बढ़ाया जा सकता है। श्रद्धा भावना से भी सकारात्मकता बढ़ती है। कुल मिलाकर सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाना है जिसके लिए सभी को निज सामर्थ्य के अनुसार सक्रिय रहना चाहिए। 

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