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शनिवार, मई 01, 2010

कैसे जाने कि विवाह कब होगा?-रामहरि शर्मा(ज्योतिष रत्न)



मनुष्य के जीवन में विवाह एक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण संस्कार है। हमारे शास्त्रों में विवाह को एक पवित्र बन्धन माना गया है। ऐसा इसलिए है कि विवाह संस्कार के उपरान्त ही व्यक्ति गृहस्थ जीवन में प्रवेश करके जीवन के चारों पुरुषार्थ की सिद्धि करता है। वेदों तथा पुराणों में भी पुरुषार्थ चतुष्टय(धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष)की सिद्धि को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। यह तभी सम्भव है जब व्यक्ति आदर्श विवाह करके अपने जीवन साथी के साथ सामंजस्य स्थापित करके एक आदर्श सन्तान को जन्म दे।
सामान्यतः सभी माता-पिताओं को सन्तान के विवाह योग्य आयु में आते ही चिन्ता सताने लगती है कि मेरे पुत्र-पुत्रियों का विवाह कब होगा? उनका वैवाहिक जीवन कैसा होगा? आदि। आधुनिक युग में तो विवाह जैसे पवित्र बन्धन का महत्त्व घटता ही जा रहा है। ऐसे में सफल वैवाहिक जीवन के विषम मे चिन्ता और बढ़ जाती है। आईए इस विषय की चर्चा करें जिसमें ज्योतिष द्वारा विवाह सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर कैसे दिया जाए। 
एक जातिका के पिताश्री ने जनवरी में इसके विवाह के विषय में पूछा-' वे बोले, पंडित जी इसके अनेक रिश्ते निरस्त हो चुके हैं। इस लड़की का विवाह तय हो ही नहीं पा रहा है। आखिरी क्षणों में हां ही नहीं होती है, कोई न कोई बाधा आ जाती है।' 
मैंने इस जातिका के जन्म आंकड़े मांगे तो उन्होंने बताया कि इसका जन्म 21 जनवरी 1979 को प्रातः 6बजकर 55मिनट पर दरभंगा बिहार में हुआ था। यहां एक जातिका की जन्म कुण्डली एवं नवांश कुण्डली बनाकर यहां अंकित कर रहे हैं। 

जन्म कुण्डली में शनि अष्टम भाव में राहु के साथ स्थित है। सप्तमेश चन्द्रमा दशम में शत्रु राशि में स्थित है। लग्न कुण्डली में सप्तम भाव पर पापी सूर्य एवं मंगल  की दृष्टि है।  इन सभी योगों के कारण सप्तम भाव पाप प्रभाव में हैं जिसके कारण कई बार रिश्ते तय होकर टूट गए, परन्तु सप्तम भाव में उच्च राशि का गुरु तथा नवांश कुण्डली में चन्द्र व गुरु का एक साथ सप्तम भाव में बैठना शुभ है। इससे यह ज्ञात होता है कि कन्या का पति सदाचारी, सज्जन, दयालु एवं सद्गुणों से भरपूर तथा सुन्दर होगा। जन्म कुण्डली में लग्नेश का अष्टम में होना, लग्न में सूर्य और मंगल की स्थिति विलम्ब से विवाह दर्शा रही है। 
जब ये सज्जन मुझसे मिलने आए उस समय जातिका को गुरु महादशा में सूर्य का अन्तर चल रहा था जोकि 11.1.2010 से 2.11.2010 तक चलेगा। अष्टमेश सूर्य लग्न में स्थित होकर विवाह के लिए अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न नहीं करता है। विवाह कब होगा? इसका सही समय ज्ञात करने के लिए ज्योतिष रत्न एक वर्षीय पत्राचार पाठ्यक्रम के पाठ 24 के अनुसार जब गुरु सप्तम भाव की राशि से 1, 5 या 9वीं राशि से गोचर करता है तो विवाह की सम्भावना उत्पन्न होती है। जैसा कि मैं पहले ही लिख चुका हूँ कि जातिका को गुरु की महादशा चल रही है और गुरु सप्तम भाव में उच्च राशि में स्थित  है और सप्तमेश चन्द्र है। अतः विवाह गुरु में चन्द्र अन्तर में होना चाहिए। चन्द्र का अन्तर 7.11.2010 से 7.3.2010 तक चलेगा इस अवधि में गुरु मीन एवं मेष राशि में गोचर करेगा। मीन राशि सप्तम भाव की राशि से नवम में स्थित है। अतः विवाह इसी अवधि में होगा, ऐसा स्पष्ट भासित होता है। विवाह का सूक्ष्म समय ज्ञात करने के लिए प्रत्यन्तर दशा देखी तो चन्द्रमा का प्रत्यन्तर 10.11.2010 से 19.12.2010 तक चलेगा और चन्द्रमा सप्तमेश है। मैंने उन सज्जन को यह जनवरी में बताया था। अभी पिछले सप्ताह में उनका फोन आया कि कन्या का विवाह 11.12.2010 में होना निश्चित हुआ है। इस प्रकार आप भी किसी जातक या जातिक की विवाह अवधि ज्ञात कर सकते हैं।   

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