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शनिवार, मई 01, 2010

ध्यान परमावश्यक है! -योगानन्द स्वामी

भारतीय संस्कृति में ध्यान प्रत्येक क्रिया का पूरक है। तभी तो घर में बुजुर्ग व्यक्ति किसी कार्य को विधिवत्‌ सम्पन्न करने हेतु यही कहता है कि भाई ध्यान से पढ़ना, ध्यान से चलना, प्रत्येक कार्य को ध्यान से करना। हम आम जीवन में ध्यान शब्द का प्रयोग तो करते हैं परन्तु यह कभी नहीं सोचते हैं कि ध्यान क्या है? ध्यान शब्द का बहुतायत में प्रयोग से यह तो स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि ध्यान जीवन का अपरिहार्य अंग है। ध्यान के बिना जीवन  अधूरा है। ध्यान के बिना किसी भी भौतिक या आध्यात्मिक लक्ष्य में सफल नहीं हो सकते हैं। ध्यान के बल पर ही सदैव आनन्दमयी व शान्तिमयी  जीवन जी सकते हैं। सही अर्थ में ध्यान स्वयं में एक बहुत बड़ी यौगिक क्रिया है। 


ध्यान क्या है?
नदी जब समुद्र में प्रवेश करती है, तब वह समुद्र के साथ एकाकार हो जाती है।ध्यान के समय सच्चिदानन्द परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य विषय का स्मरण नहीं  रहता है, अपितु उस अन्तर्यामी ब्रह्म के आनन्दमयी, ज्योतिर्मय व शान्तिमयी स्वरूप में मग्न हो जाना ध्यान है। 
धारणा ध्यान की नींव है। ज्यों-ज्यों धारणा का अभ्यास परिपक्व होगा ध्यान भी साथ-साथ होने लगेगा।  मूलतः धारणा मन को स्थूल विषय से हटाकर सूक्ष्म लक्ष्य आत्मा व परमात्मा आदि पर केन्द्रित करने को कहते हैं। 
ध्यान करने के निर्देश
ध्यान करने से पूर्व प्राणायाम अवश्य करना चाहिए। प्राणायाम से मन पूर्ण शान्त  व एकाग्र हो जाता है। शान्त मन से ही धारणा व ध्यान का अभ्यास हो सकता है।
ध्यान करते समय ध्यान को ही सर्वोपरि समझें। ध्यान के समय किसी भी अन्य विचार शुभाशुभ को महत्व नहीं देना चाहिए। ध्यान के समय चिन्तन, मनन, निदिध्यासन व साक्षात्कार का लक्ष्य ईश्वर है। 
 ध्यान करते समय मन एवं इन्द्रियों को अन्तर्मुखी बनाएं। ध्यान से पूर्व प्रतिदिन मन में यह चिन्तन करना चाहिए कि मैं प्रकृति, धन, ऐश्वर्य, भूमि, भवन, पुत्र, पौत्र, भार्या आदि रूप नहीं हूँ। ये सब व्यक्त-अव्यक्त सत्त्व मेरे स्वरूप नहीं हैं। मैं शरीर, इन्द्रियों तथा इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस व गन्ध आदि से रहित हूँ। मैं मन तथा मन के विषय, काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार आदि वासना रूप नहीं हूँ। मैं पंच क्लेश अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष व अभिनिवेश  से रहित हूँ। मैं आनन्दमयी, ज्योतिर्मयी, प्रकाशमयी, शान्तिमयी, मरमसुखमयी, त्रिगुणातीत, भावातीत, शुद्ध सत्त्व हूँ। मैं अमृत पुत्र हूँ। मैं उसी ब्रह्म का अंश हूँ। 
साधक को सदैव विवेक व वैराग्य के भाव में रहना चाहिए। स्वयं को द्रष्टा व साक्षी में अवस्थित रखकर अनासक्त भाव से समस्त शुभकार्यों को भगवान्‌ की सेवा मानकर करना चाहिए। कर्त्तव्य का अहंकार व फल की अपेक्षा रहित कर्म भगवान्‌ का क्रियात्मक ध्यान है। यह जान लें कि बाह्य सुख प्राप्ति का विचार व सुख के समस्त साधन सब दुःख रूप हैं। संसार में जब तक सुख बुद्धि बनी रहेगी तब तक भगवत समर्पण, ईश्वर प्राणिधान नहीं हो सकेगा। इसके बिना ध्यान व समाधि तक पहुंच पाना असम्भव है। 
ध्यान के लिए अर्थपूर्वक ओंकार जप का अवलम्बन सर्वोत्तम है। ईश्वर ने भ्रुवों, आंख, नाक, होंठ, कान, हृदय व छाती आदि समस्त अंगों की आकृति ओंकारमयी बनायी है। देह व समस्त ब्रह्माण्ड ओंकारमय है। जब साधक ओंकार का जप करता हुआ सर्वव्यापक सर्वान्तर्यामी परमेश्वर को सर्वत्र अनुभव करने लगता है तो उसक दिव्य रूप में ही समाहित होने लगता है। 
जैसे शरीर में आत्मा दिखाई नहीं देती है पर फिर भी शरीर के समस्त कार्य आत्मा के अस्तित्व से ही सम्पन्न होते हैं। इसी प्रकार ब्रह्माण्ड में ओंकार रूप ब्रह्म यदि इन बाह्य नेत्रों से दिखाई नहीं देता है फिर भी निज दिव्य शक्ति से उसका संचालन कर रहा है। प्रणव मन्त्र के साथ-साथ गायत्री मन्त्र का जाप भी ध्यान में किया जा सकता है। 
जब भी समय हो बैठ जाएं और द्रष्टा बनकर श्वास-प्रश्वासको दीर्घ व सूक्ष्म गति से लेते और छोड़ते हुए प्रत्येक श्वास के साथ ओम का ध्यान करें। धीरे-धीरे ध्यान स्वतः लगने लगता है। यही सहज योग है तथा ध्यान करते-करते साधक ब्रह्म के स्वरूप में तद्रूप होता हुआ समाधि के अनुपम दिव्य आनन्द को भी प्राप्त कर लेता है। साधक को सोते हुए भी इस प्रकार को ध्यान को करते हुए सोना चाहिए, ऐसा करने से निद्रा भी योगमयी हो जाती है और सम्पूर्ण जीवन योगमयी हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति को एक घंटा जप, ध्यान व उपासना अवश्य करनी चाहिए, इसी में कल्याण है।  

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