नए रूप रंग के साथ अपने प्रिय ब्‍लॉग पर आप सबका हार्दिक स्‍वागत है !

ताज़ा प्रविष्ठियां

संकल्प एवं स्वागत्

ज्योतिष निकेतन संदेश हिन्‍दी की मासिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित लेख इस ब्लॉग पर जीवन को सार्थक बनाने हेतु आपके लिए समर्पित हैं। आप इसके पाठक हैं, इसके लिए हम आपके आभारी रहेंगे। हमें विश्‍वास है कि आप सब ज्योतिष, हस्तरेखा, अंक ज्योतिष, वास्तु, अध्यात्म सन्देश, योग, तंत्र, राशिफल, स्वास्थ चर्चा, भाषा ज्ञान, पूजा, व्रत-पर्व विवेचन, बोधकथा, मनन सूत्र, वेद गंगाजल, अनुभूत ज्ञान सूत्र, कार्टून और बहुत कुछ सार्थक ज्ञान को पाने के लिए इस ब्‍लॉग पर आते हैं। ज्ञान ही सच्चा मित्र है और कठिन परिस्थितियों में से बाहर निकाल लेने में समर्थ है। अत: निरन्‍तर ब्‍लॉग पर आईए और अपनी टिप्‍पणी दीजिए। आपकी टिप्‍पणी ही हमारे परिश्रम का प्रतिफल है।

शुक्रवार, अक्तूबर 02, 2009

दोहा शतक - ज्ञानेश्वर


सनातन मूल्य खोये, रहती मात्र ग्लानि।
नैतिकता शेष न रहे, होती आत्महानि॥१॥
चैनल दे रहे सबको, रेडीमेड विचार।
स्वाध्याय है खोया, चिन्तन रहे बीमार॥२॥
सभी सजी पुस्तकें तो, हैं धूल संग अटीं। 
पड़ी-पड़ी सोचती हैं, पाठकों ने न पढ़ीं॥३॥
सीरियल देखें स्त्रियां, बिछा रहीं बिसात।
अपनों की बनकर शत्रु, देतीं अनोखी मात॥४॥
घर सारे बन चले हैं, शतरंज की बिसात।
नित चालें चलीं जातीं, देने को है मात॥५॥
घूम-घूम जग में सदा, मिली न कहीं शान्ति।
मन थका-थका सा रहे, रहती सदा भ्रान्ति॥६॥
काम फिर संलग्न हुआ, पाकर नया ध्येय। 
पल-पल जीवन जी लिया, पाने को एक श्रेय॥७॥
सफलता उतनी पाये, जितना ध्येय संग।
सभी बढ़ता देखकर, हो जाते हैं दंग॥८॥
तुम जब हंसती हो तो, लगे खिलता गुलाब।
यौवन तुम्हारा दिखे, फूल जैसा शबाब॥९॥
प्रेम किया जब तुझ संग, रहा न खुद में शेष।
समझ न आए अब मुझको, धरूं कौन सा वेष॥१०॥
होता जब निश्चित लक्ष्य, मन में ले आकार।
प्राप्ति का पागलपन, करे उसे साकार॥११॥
निज ध्येय से जब कभी, होता मन व्याप्त। 
प्रयास होते फिर सभी, दें सफलता प्रर्याप्त॥१२॥
जिस अनुपात संग किया, निज शक्ति का प्रयोग। 
उतनी पायी सफलता, पाकर उन्नति योग॥१३॥
घंटे बजे मंदिर में, प्रभु दर झुकते माथ। 
थका-मांदा मनु लौटा, पाने को एक साथ॥१४॥
नववधू करे प्रतीक्षा, कर सोलह श्रृंगार। 
मोरे पिया आयेंगे, सजा स्वप्न हजार॥१५॥
हिना से रचाये हाथ, पांव में है पायल। 
लाली चुनरिया ओढ़, चले, तो हों घायल॥१६॥
आया है तो जायेगा, तू यह ध्रुव सत्य जान। 
जीवन की क्षणभंगुरता, बुलबुले ने ली मान॥१७॥
याद में राह निहारूं, करूँ न कोई काज। 
दाना चुग लौटे विहग, बजाने लगे साज॥१८॥
गोधूलि छायी नभ पर, आती देखकर शाम। 
भानु चला घर आपने, दे दिवस को विराम॥१९॥
तूफान का मंजर देख, लाया नाव कगार। 
अंबुज संग चपला से, वर्षा करे आगाज॥२०॥
मादक मांसल देह में, रहे एक मोहपाश। 
संयम न रहे फिर कभी, मन घूमे आकाश॥२१॥
रात बने महारानी, फैलते अंधियार। 
जीत ही ली सपनों में, बाजी हजार बार॥२२॥

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्‍पणी देकर अपने विचारों को अभिव्‍यक्‍त करें।

पत्राचार पाठ्यक्रम

ज्योतिष का पत्राचार पाठ्यक्रम

भारतीय ज्योतिष के एक वर्षीय पत्राचार पाठ्यक्रम में प्रवेश लेकर ज्योतिष सीखिए। आवेदन-पत्र एवं विस्तृत विवरणिका के लिए रु.50/- का मनीऑर्डर अपने पूर्ण नाम व पते के साथ भेजकर मंगा सकते हैं। सम्पर्कः डॉ. उमेश पुरी 'ज्ञानेश्वर' ज्योतिष निकेतन 1065/2, शास्त्री नगर, मेरठ-250 005
मोबाईल-09719103988, 01212765639, 01214050465 E-mail-jyotishniketan@gmail.com

पुराने अंक

ज्योतिष निकेतन सन्देश
(गूढ़ विद्याओं का गूढ़ार्थ बताने वाला हिन्दी मासिक)
स्टॉक में रहने तक मासिक पत्रिका के प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्‍ठ एवं सप्‍तम वर्ष के पुराने अंक 1920 पृष्ठ, सजिल्द, गूढ़ ज्ञान से परिपूर्ण और संग्रहणीय हैं। सातों पुस्तकें पत्र लिखकर मंगा सकते हैं। आप रू.1950/-का ड्राफ्‌ट या मनीऑर्डर डॉ.उमेश पुरी के नाम से बनवाकर ज्‍योतिष निकेतन, 1065, सेक्‍टर 2, शास्‍त्री नगर, मेरठ-250005 के पते पर भेजें अथवा उपर्युक्त राशि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अकाउंट नं. 32227703588 डॉ. उमेश पुरी के नाम में जमा करा सकते हैं। पुस्तकें रजिस्टर्ड पार्सल से भेज दी जाएंगी। किसी अन्य जानकारी के लिए नीचे लिखे फोन नं. पर संपर्क करें।
ज्‍योतिष निकेतन, मेरठ
0121-2765639, 4050465 मोबाईल: 09719103988

विज्ञापन