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सोमवार, सितंबर 28, 2009

क्या प्रारब्ध बदला जा सकता है?-आर. एस. वर्मा (ज्योतिष रत्न)



पुरुष परिवर्तन रहित व प्रकृति परिवर्तनशील है। जब पुरुष प्रकृति के साथ सम्बन्ध जोड़ता है तो उस क्षण प्रकृति की क्रिया पुरुष का कर्म होती है। क्रियमाण, संचित व प्रारब्ध तीन प्रकार के कर्म बताए गए हैं। जो कर्म वर्तमान में हो रहे हैं वे क्रियमाण कर्म होते हैं, वर्तमान से पूर्व संगृहीत कर्म चाहे इस जन्म के या पूर्व अनेक जन्म के हों वे संचत कर्म होते हैं।
संचित से जो कर्म फल देने के लिए प्रस्तुत हो गए हैं, वे प्रारब्ध कर्म होते हैं। वे अनुकूल/प्रतिकूल परिस्थितियों के स्वरूप में, जन्म आयु वातावरण में परिवर्तित होकर या इस रूप में प्रस्तुत होकर फल देते हैं। शास्त्रानुसार वर्तमान कर्म शुभ क्रियमाण कर्म हैं और पंच मकार(काम, क्रोध, लोभ, मोह अहंकार) से अशुभ होते हैं। इस प्रकार कर्मों के दो भाग बनते हैं एक फलांश व दूसरा संस्कार अंश। फलांश के दो भेद होते हैं-एक दृष्ट व दूसरा अदृष्ट। दृष्ट के भी दो भेद हैं-तात्कालिक और कालान्तरिक। अदृष्ट के भी दो भेद हैं-लौकिक एवं पारलौकिक। लौकिक फल हेतु शुभकर्म शास्त्राानुसार विधि पूर्वक अनुकूल की प्राप्ति या प्रतिकूल की निवृत्ति हेतु किए जाते हैं, जैसे यज्ञ, दान, तप, व्रत, जप, तीर्थ आदि। ये प्रारब्ध बनकर इस जन्म में फल देते हैं।
इस या अनेक जन्म में किए गए कर्म अन्तःकरण में संगृहीत रहते हैं, ये कर्म संचित होते हैं। इनके फलांश से प्रारब्ध बनता है और संस्कार अंश से स्फुरणा। इन स्फुरणा से आगे नये क्रियमाण कर्म बनते हैं जिसमें कुछ संचित कर्म से जुड़ जाते हैं। संचित कर्म को शुभ स्फुरणा मनुष्य को कर्म करने को बाध्य नहीं करती है परन्तु अशुभ स्फुरणा(पंच मकार से उत्पन्न) संकल्प बनती है और कर्म करने को बाध्य करती है। जब तक अन्तःकरण शुद्ध न हो जाये परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती है तब तक ये अच्छी बुरी स्फुरणायें नहीं मिट सकती हैं।
प्रकर्षेण आरब्धः प्रारब्धः अर्थात्‌ संचित से जो कर्म फल देने को उद्यत होते हैं वे प्रारब्ध कर्म होते हैं जिनको अनुकूल-प्रतिकूल मिश्रित परिस्थितियों के अनुरूप मनुष्य स्वेच्छा, अनिच्छा या परेच्छा पूर्वक भोगता है। वर्तमान परिस्थिति प्राप्त फल व भविष्य में आने वाली प्रतिकूल, अनुकूल मिश्रित परिस्थति प्रारब्ध कर्म का अप्राप्त फल है। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। करने की चीज कर्तव्य है और होने की चीज फल है। मनुष्य का कर्म करने में अधिकार है, फल में नहीं। करना पुरुषार्थ के अधीन है जिसमें हम स्वाधीन हैं और होना प्रारब्ध के अधीन है जिसमें हम पराधीन होते हैं। समस्त परिस्थितियों को समभाव से सहना व एकमात्र ईश्वर की शरणागति होना, इन कर्मबन्धनों से निवृत्ति का उपाय है, क्योंकि उदार हृदय ईश्वर ही शरणागत को अपना स्वामी बना लेते हैं। वरना इस जगत्‌ में कौन अपने दास को स्वामी बनाता है।
इन कर्मों के भेद व फल के अतिरिक्त शास्त्र प्रारब्ध परिवर्तन करने के कुछ उपाय भी बताते हैं। साध्य कुछ और है तो यह शरीर भी तो साधन है उसे पाने का।
नवीन प्रबल कर्म(क्रियमाण) संस्कार बनाकर प्रारब्ध के किसी फलोन्मुख संस्कार कर्म में डालकर, संचित से किसी कर्म संस्कार को बलात्‌ प्रारब्ध में ले आकर, प्रारब्ध से संस्कार अन्यत्र ले जाकर प्रारब्ध बदला जा सकता है। यह इन उदाहरणों से समझा जा सकता है-यदि किसी के पुत्रा नहीं है या धन नहीं है तो इसका तात्पर्य यह है कि इनके प्रारब्ध में इन्हें देने वाले संस्कार या शुभकर्म नहीं हैं। किसी को कोई भयंकर रोग है तो उसके प्रारब्ध में उस रोग को दने वाले कर्म संस्कार विद्यमान हैं। जब कोई प्रबल सकाम अनुष्ठान करता है तो नवीन प्रारब्ध बनता है और पुत्रा या धन पाने की अनुकूल परिस्थिति उत्पन्न कर देता है। यदि कोई पुण्यात्मा रोगी की व्याधि शास्त्रानुसार ग्रहण कर ले तो उसका अशुभ लौकिक कर्म संस्कार जनित प्रारब्ध, उस ग्रहण करने वाले पुण्यात्मा के प्रारब्ध में चला जाएगा और व्यक्ति रोग मुक्त हो जाएगा।
दूसरा उपाय यह है कि कोई सिद्ध पुरुष कर्मनियन्ता को ही विवश करके रोगी के लौकिक प्रारब्ध संस्कार को हटाकर किसी संचित कर्म में डाल दे तो उसका रोग दूर हो जायेगा परन्तु यह रोग फिर प्रारब्ध में फलित होगा। यदि कोई शुभफलदायक संस्कार प्रारब्ध में नहीं है तो किसी पुण्यात्मा की प्रेरणा से शुभअनुष्ठान द्वारा कर्मनियन्ता की सन्तुष्टि हेतु कोई कर्म संचित से प्रारब्ध से संचित में मिल जाए तो प्रारब्ध बदला जा सकता है।
प्रारब्ध परिवर्तन को किस सीमा तक बदला जा सकता है यह भी प्रारब्ध और क्रियमाण कर्म की शक्ति पर निर्भर करता है। कभी-कभी सकाम अनुष्ठान सफल नहीं होते हैं, ऐसे में क्रियमाण कर्म प्रारब्ध से निर्बल हाते हैं। अतः क्रियमाण कर्म की शक्ति पर प्रारब्ध परिर्वतन निर्भर है क्योंकि इसका फल संचित व प्रारब्ध दोनों में जा सकता है।
सदैव शुभकर्मरत रहना चाहिए इससे ही सुकर्म का खाता बढ़ता है और कर्मों को शक्ति प्राप्त होती है। जब सबके हित में प्रीति और प्रभु शरणागति हो तो उसकी कृपा सहज हो जाती है। सर्वव्यापक व कर्मनियन्ता वही है।

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