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बुधवार, फ़रवरी 16, 2011

उत्तम गृह और ज्योतिष योग-डॉ. उमेश पुरी 'ज्ञानेश्वर' ( भाग-दो )


          मनुष्य का भाग्य जन्म लेते ही निर्धारित हो जाता है। ग्रह-दशा के परिवर्तन के साथ-साथ उनका भाग्य भी परिवर्तित होता रहता है। मनुष्य का जीवन भाग्य और वास्तु से प्रभावित होता है। दोनों का प्रभाव 50-50 प्रतिशत है। मनुष्य अपने भाग्य को तो बदल नहीं सकता परन्तु वास्तु की सहायता से निज प्रयत्नों को सफलता तक अवश्य पहुँचा सकता है। यदि मनुष्य का भाग्य उत्तम है और वास्तु दूषित है तो प्रयासों का परिणाय 50 प्रतिशत ही मिलेगा। यदि वास्तुदोष भी दूर हो जाए तो शत-प्रतिशत प्रयास सफल हो सकते हैं। यदि भाग्य निर्बल है और वास्तु दोष भी है तो सफलता मिलनी असंभव है। यदि वास्तु दोष दूर कर लें तो प्रयास 50 प्रतिशत सफल हो सकते हैं, जबकि भाग्य तो बदला नहीं जा सकता है। वास्तु और ज्योतिष का सनातन सम्बन्ध है। यदि भवन वास्तु दोष युक्त हो और भाग्य भी निर्बल हो तो उसमें रहना कदापि उचित नहीं है क्योंकि उसमें रहने वाला व्यक्ति दुःखी, अशान्त और कंगाल हो सकता है। यहां उन ज्योतिष योगों की चर्चा करेंगे जिनको अपनी जन्मकुण्डली में देखकर आप यह निश्चय कर सकेंगे कि भूमि प्राप्ति व भवन निर्माण का योग आपके भाग्य में है या नहीं। मनुष्य जीवन का सौभाग्य एवं सार्थकता उत्तम भवन निर्माण करना है। मनुष्य जीवन के पुरुषार्थ, पराक्रम एवं अस्तित्त्व की सर्वप्रथम पहचान उसके भवन से होती है। जनसंख्या वृद्धि के कारण सभी भवन के स्वामी बन सकें यह संभव नहीं है। एक चौथाई जनसंख्या तो आवास विकास परिषद् द्वारा निर्मित घरों में रह रही है। कुछ भवनों के स्वामी सुखी व समृद्ध हैं तो कुछ के निर्धन एवं दुःखी। ऐसी जटिल परिस्थितियों में भवन-निर्माण संबंधी योगों पर ज्योतिषात्मक  चिन्तन करना जटिल है। लेकिन फिर भी हम यहाँ इसकी चर्चा करेंगे। पूर्व लेख में कुछ ज्‍योतिष योगों की चर्चा करी थी। अब उस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अन्‍य योगों की चर्चा करेंगे।
बिना प्रयास या अल्प प्रयास के भवन प्राप्ति का योग-पहले व सातवें भाव का स्वामी पहले (लग्न) भाव में हो तथा चौथे भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो व्यक्ति को बिना प्रयास के भवन प्राप्त होता है। जन्मकुण्डली के चौथे भाव का स्वामी उच्च, मूलत्रिकोण या स्वराशि में हो तथा नौवें भाव का स्वामी केन्द्र(1, 4, 7, 10) भाव में हो तो ऐसे जातक को थोड़े प्रयास में ही भवन प्राप्ति हो जाती है। जन्मकुण्डली के पहले और सातवें भाव का स्वामी पहले या चौथे भाव में हो और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो, नौवें भाव का स्वामी केन्द्र(1, 4, 7, 10) भाव में हो और चौथे भाव का स्वामी उच्च, मूल त्रिाकोण या स्वराशि का हो तो ऐसा व्यक्ति थोड़े प्रयास से अच्छा भवन प्राप्त कर लेता है।
कोठी प्राप्ति का योग-जन्मकुण्डली के चौथे भाव का स्वामी यदि दसवें भाव के स्वामी के साथ केन्द्र-त्रिकोण (1, 4, 5, 7, 9, 10) भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति को सुख-सुविधाओं से युक्त कोठी प्राप्त होती है।
भूमि, वाहन, माता और संगीत का सुख प्राप्ति योग-जन्मकुण्डली के चौथे भाव का स्वामी स्वराशि, स्वनवांश था उच्चराशि में हो तो ऐसे व्यक्ति को भूमि, वाहन, माता और संगीत से सुख प्राप्त होता है।
विभिन्न प्रकार के भवन प्राप्ति का योग-जन्मकुण्डली के चौथे भाव का स्वामी व दसवें भाव का स्वामी एक साथ युति करके शनि एवं मंगल के साथ हों तो ऐसे व्यक्ति के पास विभिन्न प्रकार के भवन होते हैं।
प्रचुर धन सहित भवन प्राप्ति का योग-दूसरे व ग्यारहवें भाव के स्वामी चौथे भाव में स्थित हो और चौथे भाव का स्वामी शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हो तो ऐसे व्यक्ति को प्रचुर धन सहित भवन प्राप्त होता है।
भूपति होने का योग-जन्मकुण्डली के चौथे भाव का स्वामी दसवें भाव में और दसवें भाव का स्वामी चौथे भाव में हो तथा मंगल ग्रह बली हो तो व्यक्ति बहुत भूमि का स्वामी अर्थात्‌ भूपति होता है। जन्मकुण्डली के दसवें और चौथे भाव के स्वामी बलवान हों और एक दूसरे के मित्र हों तो भी ऐसा व्यक्ति भूपति अर्थात्‌ बहुत भूमि का स्वामी होता है। जन्मकुण्डली के चौथे भाव का स्वामी व चौथा भाव दोनों शुभग्रहों से युत हों तो भी ऐसा व्यक्ति भूमि का स्वामी होता है। जन्मकुण्डली के चौथे भाव का स्वामी पाँचवें भाव में हो तो भी ऐसा व्यक्ति बहुत भूमि का स्वामी होता है। जन्मकुण्डली में चौथे भाव का स्वामी स्वराशि का 10 या 11वें भाव में हो और शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत भूमि का स्वामी होता है।
भाई द्वारा भूमि प्राप्ति का योग-जन्मकुण्डली के तीसरे भाव का स्वामी या तृतीय भाव का कारक मंगल चौथे भाव के स्वामी के साथ स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति को भाई से भूमि प्राप्त होती है।
स्त्री द्वारा भूमि प्राप्ति का योग-जन्मकुण्डली में शुक्र चौथे भाव में और चौथे भाव का स्वामी सातवें भाव में स्थित हो और ये दोनों परस्पर मित्र हों तो ऐसे व्यक्ति को पत्नी या स्त्री के द्वारा भूमि प्राप्त होती है।
शत्रु से भूमि प्राप्ति का योग-जन्मकुण्डली में छठे भाव का स्वामी चौथे भाव में और चौथे भाव का स्वामी छठे भाव में स्थित हो तथा छठे भाव का स्वामी चौथे भाव के स्वामी से अधिक बली हो तो ऐसे व्यक्ति को शत्रु से भूमि प्राप्त होती है।
सम्पत्ति व भवन हानि या नष्ट होने का योग-चौथे भाव का स्वामी बारहवें या आठवें भाव में होकर पाप ग्रहों से युत या दृष्ट हो तो ऐसे व्यक्ति की सम्पत्ति व भवन नष्ट हो जाती है। उसका भवन सम्बन्धी, किरायेदार या शत्रु द्वारा हड़प लिया जाता है या प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो जाता है। चौथे भाव के स्वामी का जाप या रत्न धारण करने से इस हानि से बचा जा सकता है। चौथे भाव का स्वामी जिस नवांश राशि में हो उसका स्वामी ग्रह बारहवें या आठवें भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति की सम्पत्ति व भवन उसके हाथों से निकल जाता है या हानि व नष्ट हो जाता है।
आप इन योगों को अपनी कुण्डली में ढूँढकर यह निर्णय कर सकते हैं कि भवन व भूमि प्राप्ति का योग आपके भाग्य में है या नहीं। 
        लेख का पहला भाग पढ़ने के लिए नीचे लिखे यूआरएल पर क्लिक करें। 

1 टिप्पणी:

  1. उत्तम लेख है। एक तरह से भवन प्राप्ति से सम्बंधित ज्योतिषीय योगों का सार है। इसी तरह का लेख विद्या प्राप्ति के लिए देंगें तो अति कृपा होगी क्योंकि विद्या प्राप्ति के लिए कहीं द्वितीय भाव, कहीं चतुर्थ भाव तो कहीं पंचम भाव देखने को लिखा रहता है।

    गोपाल

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