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गुरुवार, अगस्त 26, 2010

ग्रहों का शिक्षा पर पड़ता प्रभाव : एक अनुभूत चिन्तन -रामहरी शर्मा



यह जान लें कि जन्मकुंडली के भावों एवं ग्रहों की विशिष्ट स्थितियों का हम सबके जीवन पर निश्चित प्रभाव पड़ता है। हमारा व्यक्तित्व, स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यवसाय, धन आदि सभी कुछ ग्रहों से प्रभावित होता है। बाल्यकाल से युवावस्था तक विद्यार्जन के लिए किए गए सभी प्रयासों का निर्धारण कुंडली में स्थित सूर्यादि ग्रह करते हैं। व्यक्ति की किसी भी प्रकार की  शिक्षा की ओर रुचि या अरुचि इन्ही ग्रहों के प्रभाव से होती है। इस लेख में मैं अपनी बाल्यकाल से युवावस्था तक प्राप्त समस्त शिक्षा प्राप्ति तक विभिन्न ग्रहों व परिस्थितियों का विश्लेषण करूंगा। मैं एक ज्योतिषी हूं और कोई भी ज्योतिषी अपनी कुंडली का विश्लेषण अधिक अच्छे ढंग से कर सकता है। 
मेरा जन्म 2.7.1965 में 4 बजे प्रातः में मथुरा में हुआ है। इस जातक की कुण्डली एवं नवांश कुण्डली इस प्रकार है- 

प्रत्येक व्यक्ति कैसी शिक्षा पाएगा और उसकी रुचि किस विषय में होगी, इस सबका चयन जन्मकालीन ग्रहों से होता है। मेरी रुचि आर्ट विषयों में प्रारम्भ से थी जोकि जन्म कुंडली से स्पष्ट है। पंचमेश बुध चन्द्र एवं शुक्र के साथ तीसरे भाव में स्थित है। सोने में सुहागा यह है कि गुरु का लग्न भाव में स्थित होना, जोकि कला में रुचि देता है। आर्ट विषयों से हाईस्कूल परीक्षा 1980 में उत्तीर्ण की। मेरे पिताजी को कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि आपके पुत्रा को विज्ञान विषयों से पढ़ना चाहिए। तब मेरे पिताजी ने पुनः विज्ञान विषयों से मेरा प्रवेश 1982 में करा दिया तो यह प्रक्रिया 1986 में बी.एस.-सी. तक जारी रही। इसके पीछे कारण शुक्र महादशा में सूर्य, चन्द्र, मंगल, राहु का अन्तर एवं गोचर में शनि का पंचम भाव में होना। अतः स्पष्ट है कि सूर्य, चन्द्र, मंगल, शनि व राहु व पंचम बुध  विज्ञान के कारक हैं। राहु बाधाकारक होने के कारण इसने स्नातक परीक्षा पास कराने के बाद रोक लगा दी। सन्‌ 1986 में वायुसेना में प्रवेश के बाद राहु अन्तर्दशा व मंगल प्रत्यन्तर में एविएशन इंजीनियरिंग में बी.टेक. करने में सफल रहा क्योंकि राहु व मंगल तकनीकी शिक्षा दिलाते हैं। सन्‌ 1992 में मेरा फिर से कला विषयों की ओर रुझान हुआ। 1992 से 1994 तक बी.ए. किया तब शनि की अन्तर्दशा चल रही थी, शनि कुंडली में बली होकर दशम में स्थित है। शनि अंग्रेजी कारक है तो 1996 तक अंग्रजी से एम.ए. करने तक यह जारी रहा। सन्‌ 1997 से 2000 तक तीन साल तक शिक्षा स्थगित रही, तब सूर्य में राहु की अन्तर्दशा चल रही थी। राहु के बाद जब गुरु की अन्तर्दशा प्रारम्भ हुई तो मैं संस्कृत से एम.ए. करने में सफल रहा। मेरी शिक्षा के विषय में एक रोचक तथ्य यहै है कि गुरु की पंचम दृष्टि पंचम पर होने के कारण मेरी रुचि शिक्षक बनने की रही। इसी कारण मैंने 1998 में बी.एड. में प्रवेश लिया, परन्तु छोटे भाई का विवाह होने के कारण मैं परीक्षा देने से वंचित रहा। इस समय सूर्य में सूर्य में राहु प्रत्यर्न्दशा थी। पर गुरु का प्रभाव मुझे फिर भी प्रेरित करता रहा और एक बार फिर मैंने 2008 में प्रवेश लिया और प्रथम वर्ष 72प्रतिशत से उत्तीर्ण कर लिया और दूसरे वर्ष की परीक्षा भी ठीक रही पर बंगलौर विश्वविद्यालय ने 41 विद्यालयों का परिणाम अनियमिताओं के चलते रोक लिया और एक बार फिर बी.एड. परीक्षा में असफलता का मुख देखना पड़ा। कारण स्पष्ट है कि चन्द्रमा में शनि की अन्तर्दशा का चलना।  मेरी उपर्युक्त शिक्षा प्राप्ति की यात्रा से यह स्पष्ट होता है कि समय-समय पर विभिन्न प्रकार के ग्रह अपनी महादशा, अन्तर्दशा एवं प्रत्यन्तर दशा में अलग-अलग ढंग से प्रेरित करते हैं और शिक्षा का क्षेत्रा कैसे बदलता रहता है। शिक्षा में कैसे बाधाएं आती हैं। निष्कर्षतः मैं यह कह सकता हूं कि किसी भी कुंडली से शिक्षा कैसी और किस विषय की होगी, यह सब अध्ययन करके जान सकते हैं।

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