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बुधवार, अगस्त 18, 2010

श्रावणी कर्म-व्रतानन्द स्वामी



     श्रावणी कर्म का विशेष महत्व है। विप्रों को इस दिन सरोवर या नदी किनारे जाकर शास्त्रानुसार श्रावणी कर्म करना चाहिए।  पंचगव्य अर्थात्‌ गाय का दूध, गाय का घी, गाय का दही, गोबर एवं गोमूत्र पान करके शरीर को शुद्ध करके हवन करना उपाकर्म है। इसके उपरान्त जल के सम्मुख बैठकर सूर्य को प्रशस्ति करके अरुन्धती सहित सातों ऋषियों की अर्चना करके दही तथा सत्तू की आहुति देनी चाहिए। इसे उत्सर्जन कहते हैं। इसी दिन यज्ञोपवीत के पूजन का विधान है। पुराना यज्ञोपवीत उतार करके नया धारण करन इस दिन की श्रेष्ठता है। इस दिन उपनयन संस्कार करके विद्यार्थियों को गुरुकल या विद्यालय में विद्या या ज्ञानार्जन के लिए भेजा जाता है। यह कर्म श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को आरम्भ होता है।
    इस प्रकार श्रावणी के पहले दिन अध्ययन का श्रीगणेश होता है।  इस दिन रक्षाबन्धन भी होता है।
    इस दिन बहनें भाईयों रक्षासूत्र बांधकर तिलक करती हैं। राखी का वास्तविक अर्थ है कि हे भाई! जब तक मेरी बलिष्ठ कलाई में रक्त की अन्तिम बूंद भी है तब तक मेरी आपातकालीन स्थिति में सुरक्षा का दायित्व तुझ पर है।

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