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मंगलवार, जून 08, 2010

भ्रान्ति से मुक्ति अन्तः में है!-सत्यज्ञ



     यह सर्वविदित है कि जीवन को ज्ञान और कर्म का सन्तुलन कहा गया है। जहां ज्ञान है वहां व्यक्ति स्वयं को जानता हुआ अपने लक्ष्य को कर्म के योग से पा लेता है। जहां ज्ञान के स्थान पर अज्ञान प्रबल हो वहां जीवन में केवल भ्रान्ति रहती है। ज्ञान-अज्ञान दोनों माया भाव हैं, व्यक्ति दोनों में से एक को चुनता है। ज्ञान हो या अज्ञान दोनों का क्षेत्र विशाल है। अविद्या अर्थात्‌ अज्ञान को समझने की आवश्यकता नहीं पड़ती है क्योंकि यह जन्म से ही साथ में है। अविद्या को विद्या की बड़ी बहन कहा जाता है। अधर्म, अनैश्वर्य, अवैराग्य के मूल में अविद्या होती है। इसी से असन्तोष उपजता है। अज्ञान का प्रहला प्रभाव अहंकार और दूसरा प्रभाव लक्ष्य का अभाव। अहंकार जीव से जुड़ा है इसलिए उसका लक्षण है। लक्ष्य ज्ञान भाग है और बुद्धि से जुड़ा है। दोनों के मूल में मन और मन में उठने वाली कामनाएं हैं जो इसे चंचल बनाती हैं। बुद्धि और शरीर इन कामनाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं। व्यक्ति जीवन के चौराहे पर खड़ा है और एक दिशा में चलता है और फिर लौटकर चौराहे पर आ जाता है और अन्य दिशा की ओर चलने लगता है, फिर चौराहे पर आ जाता है। जीवन यात्रा में वह स्वयं को बार-बार चौराहे पर पाता है। जीवन की उपलब्धियां  उसे शान्त न करके भ्रान्त करती हैं। सुख की परिकल्पना भी भ्रान्ति लगती है। भ्रान्ति तमोगुण बढ़ाती है। ऐसे में पंच मकार के प्रभाव में व्यवहार आ जाता है जिसका परिणाम दुःख ही होता है। बाह्य जीवन की अपेक्षा अन्तः में जाने से भ्रान्ति दूर होती है।

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