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गुरुवार, मई 06, 2010

आदतें व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं! -सत्यज्ञ




    हमारे बहुत से कार्य ऐसे होते हैं, जो हम इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्हें करने की या किसी खास तरह से करने की हमें आदत पड़ गई है। हमारे बहुत से कार्य स्वतः आदत के तहत होते चले जाते हैं, जिनके लिए हमें बहुत अधिक सोचना नहीं पड़ता।
    प्रायः आदत से हम समझते हैं, चाय पीने की आदत, जल्दी सोने की आदत, पढ़ने या न पढ़ने की आदत या कोई ऐसा कर्य जिसे व्यक्ति आवश्यकता से अधिक बार करता है। परन्तु आदत की परिभाषा इससे कहीं अधिक है। हम बाल्यकाल से जिस प्रकार काम करना, कम या अधिक बोलना, जल्दी या देर से नाराज होना सीखते हैं, वहीं धीरे-धीरे हमारी आदत बन जाता है। स्पष्ट है कि व्यक्ति का व्यक्तितत्व निज आदतों से ही विशिष्ट बनता है। 
    आदत व्यक्ति का ऐसा गुण या अवगुण है, जो एक सीमा तक व्यक्ति की सफलता या असफलता में महत्वपूर्ण योगदान देती है। यदि आदत अच्छी है, तो उसी के कारण व्यक्ति ऐसा कर बैठता है जो किसी के वश में नहीं होता है। यदि आदत बुरी है या नकारात्मक है तो सभी योग्यताओं के बावजूद भी उपलब्धि हाथ आते-आते रह जाती है। बुरी या अच्छी आदत में हमारा अपना ही योगदान होता है। उन पर हम इतना परिश्रम करते हैं कि उनमें हमें विशिष्टता प्राप्त हो जाती है और इसी कारण कई बार हमें हमारे जीवन की दिशा परिवर्तित हो जाती है।
आदत कैसे बनती है?
    यदि कोई व्यक्ति शीघ्र घबरा जाता है, साहस छोड़ देता है या शीघ्र क्रोधित हो जाता है, तो कहते हैं कि इसका तो स्वभाव ही ऐसा है। मूलतः यह सब आदत स्वभाव बन जाती हैं। यदि सकारात्मक होंगी तो प्रतिक्रिया भी सकारात्मक होगी और यदि आदत नकारात्मक है तो हमारी प्रतिक्रिया भी नकारात्मक होगी। विपरीत परिस्थिति में स्वयं को संभालना, हादसे को नकार कर प्रसन्न होना, बाधाओं में अवसर खोजना हमारी आदत पर निर्भर है।
    हमारी प्रतिक्रिया छोटी या बड़ी घटना में समान रूप से होती है। यह नहीं सोचना चाहिए कि इससे क्या फर्क पड़ता है। प्रत्येक अवसर पर योग्यता अभिव्यक्त करनी चाहिए, अवसर की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। छोटे-छोटे बोले गए झूठ निरन्तर बोलते रहने से आदत बन जाते हैं। हमें प्रत्येक स्थान और अवसर पर अपनी प्रतिक्रया सोच-समझकर व्यक्त करनी चाहिए, इन्हीं से हमारे विशिष्ट चरित्र का निर्माण होता है। ध्यान रखें कि आदत ऐसी न पड़ जाए जो आपको और आपके व्यक्तित्व को हानि पहुंचाए।
    जो कार्य बार-बार किया जाए वह आदत बन जाता है। सर्वप्रथम कार्य सीखकर फिर उसे विभिन्न अवसरों पर उसकी पुनरावृत्ति करते हैं, धीरे-धीरे वही हमारी आदत बन जाती है।
    प्रायः आदतें बचपन में पड़ती हैं, तब हमें यह भान नहीं होता कि ये अच्छी हैं या बुरी। बाद में ये व्यक्तित्व का एक भाग लगने लगती हैं। हम जो करते हैं, उसे छोड़ना नहीं चाहते है, उसे निज जीवन में स्वीकार कर लेते हैं। आदतें हानि करती हैं तो एक प्रवाह भी लाती हैं।
    यदि आप चाहते हैं कि कार्य भली-भांति हो तो उसे आदत बना लेना चाहिए। बिना आदत के कोई कार्य करेंगे तो उसमें अटकाव आता है, लेकिन आदत होने से उसमें प्रवाह आ जाता है।  शायद तभी कहा गया है कि करत-करत अभ्यास के जड़मति होय सुजान। कुशल लोग भी निरन्तर अभ्यास को महत्व देते हैं। अभ्यास वहीं आवश्यक है जहां हम कुशलता चाहते हैं। अभ्यास की आदत कुशलता लाती है। लोगों की आदतें व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं। प्रायः हमें वहीं आदतें पड़ती हैं जो हम अपने आसपास देखते हैं। ऐसे में सावधानी आवश्यक है।
    यह मनोकांक्षा सबकी होती है कि आदतें अच्छी हों। अच्छी आदतों से ही सकारात्मक व्यक्तित्व बनता है। आदतें छोड़कर अच्छी आदतें अपनाना प्रायः कठिन है, पर असम्भव नहीं है। यह हो सकता है कि थोड़ा समय अधिक लगे। ऐसा कदापि नहीं है कि आदत छोड़ी न जा सके। यदि आदत नहीं बदल पा रहे हैं तो यह जान लीजिए कि आपमें इसे बदलने की इच्छा ही नहीं है। यह मानना छोड़ दीजिए कि आदत को बदला नहीं जा सकता है। इच्छा करते हुए ईमानदारी से प्रयास किया जाए तो प्रत्येक आदत को छोड़ा जा सकता है। 
लोग कहने लगते हैं कि अब तो बहुत देर हो चुकी है, अब तो इसे बदला ही नहीं जा सकता है। स्वयं को बदलने के लिए देर कभी नहीं होती है। कहावत भी लोकप्रिय है कि देर आयद दुरुस्त आयद। अच्छी आदतों को किसी भी समय अपनाया जा सकता है। यदि आपमें मन से बदलने की इच्छा है तो आप किसी भी आयु में यह कर सकते हैं। सर्वप्रथम मन से यह नकारात्मक सोच निकाल फेंकें कि बचपन में पड़ी आदत बदली नहीं जा सकती है। आपकी प्रबल इच्छा का न होना और मन में नकारात्मक सोच होना ही आपको बदलने से रोकती है।
सोच में बदलाव लाएं
आदत बदलने के लिए सर्वप्रथम सोच में बदलाव लाएं, यह अत्यन्त आवश्यक है। आप आत्मनिरीक्षण करें कि आपके अन्दर क्या दोष हैं और क्या गुण हैं। तदोपरान्त मन से तैयार हो जाएं कि बदलना है। यदि आपने यह पक्का इरादा बना लिया तो समझ लें कि आधा कार्य हो गया, शेष तो बदलने का प्रयास करना है। दोषों को त्यागने और गुणों को अपनाने में अनुशासन और परिश्रम की आवश्यकता होती है। संयम से स्वभाव को अनुशासित करेंगे तो निश्चय ही आदतों से मुक्ति पा लेंगे।

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