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शुक्रवार, मई 21, 2010

शारीरिक रोग, बुढ़ापा और योग -योगानन्द स्वामी



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          क्या शारीरिक रोग और बुढापा रोके जा सकते हैं? क्या मानसिक रोग रोके जा सकते हैं? क्या कुछ भी ऐसा हो सकता है कि मनुष्य न तो तन से बीमार पड़े, न मन से बीमार पड़े और न बूढ़ा हो?
          आप सोचकर देखें कि यदि ऐसा होता तो संसार स्वर्ग सदृश ही हो जाता। यानि संसार को स्वर्ग बनया जा सकता है। तन और मन के रोग रोके जा सकते हैं और बुढ़ापे को दूर भगाया जा सकता है। यदि हम स्वास्थ्य के नियमों का पालन करें तो सम्भवतः ऐसा हो सकता है।
         यदि हम आहार-विहार में संयम बरत सकें, अपने आपको मानसिक तनाव और द्वन्द उत्पन्न करने वाले वातावरण से अलग रख सकें या ऐसे वातावरण  में भी स्वयं को संयत और शान्त रख सकें, तनाव मुक्त रख सकें तो हमारे मानसिक रूप से बीमार पड़ने की संभावना बहुत कम होगी। हम यहां जन्मजात मिले रोगों की बात नहीं बता रहे हैं। हम तो प्राकृतिक स्वास्यि के नियम पालन कर स्वस्थ रहने की बात कर रहे हैं। अन्य रोगों से तो बचाव के अन्य साधन हैं और ये नियम पालन उसमें भी सहयोगी हैं।
तनाव रहित जीवन हो या तनाव में स्वयं को शान्त रख सकें और स्वस्थ भोजन, समुचित व्यायाम कर सकें तो       हम स्वस्थ रह सकते हैं। व्यायाम की बात करें तो योग सर्वोत्तम व्यायाम है।
            यह जान लें कि आसन विभिन्न पेशियों, नाड़ितन्त्रों ओर सामान्य और नलिकाविहीन ग्रन्थियों और संस्थानों की गतिविधियों को सन्तुलित करते हैं। इसीलिए शरीर बीमार होने से बच जाता है और हम स्वस्थ रहते हैं। 
              यह सत्य है कि यदि रोग भी है तो आसन उन्हें दूर कर सकते हैं। ध्यान और योग मन को शान्त करता है। तनाव और द्वन्दों से मुक्ति दिलाता है। जीवन के प्रति ऐसा सन्तुलित, स्वस्थ और आध्यात्मिक दृष्टिकोण देता है कि मनुष्य का मन कभी रोग ग्रस्त ही नहीं हो सकता है।
              जहां तक बुढापा रोकने की बात है तो यह भी सम्भव है।  यदि आप प्रारम्भ से अपने शरीर को नीरोग और पुष्ट तथा सक्रिय रख सकें और दृष्टिकोण ऐसा बना सकें कि मनुष्य का वृद्ध होना आवश्यक नहीं, वह चाहे तो जीवन के अन्तिम क्षणों तक युवा रह सकता है। 
           यह सत्य है कि समय के साथ-साथ कुछ छीजन तो हाता ही है। मनुष्य के शरीर का, उसके विभिन्न अंगों का परिवर्तन तो होता ही है। विज्ञान यह खोजने की कोशिश कर रहा है कि मनुष्य के बुढ़ापे के क्या कारण हैं। अधिकांश वैज्ञानिक इस तथ्य पर पहुंचे हैं कि समय के साथ, आयु के साथ, शरीर स्थित नलिकाविहीन ग्रन्थियां सूखती जाती हैं और उनके हार्मोन क स्राव की मात्रा कम और असन्तुलित होती जाती है। इसका प्रभाव विभिन्न अंगों पर पड़ता है जिससे शरीर और मन में जो लक्षण उत्पन्न होते हैं वही बुढ़ापा है।
             योगासन ग्रन्थियों को दीर्घकाल तक युवा एवं सक्रिय रख सकते हैं। साथ में मन का प्रभाव सारे तन और इसके संस्थान पर अत्यधिक दूर तक प्रभाव डालता है। यदि कोई यह निश्चय कर ले कि वह कभी बूढ़ा नहीं होगा तो वह सदैव तन और मन से युवा रहेगा। वह सच में बूढ़ा नहीं होगा। अंग्रेजी में एक कहावत है कि मनुष्य उतना ही युवा होता है जितना अनुभव करता है। 
             आप साठ-सत्तर की आयु में स्वयं को आधी अवस्था का महसूस करेंगे तो आप चिरयुवा रह सकेंगे इसमें भी सत्यता है। मन का भाव है जो हमें शीघ्र बूढ़ा कर देता है। वरना तो आप और हम सब योग के बल पर वृद्धावस्था तक युवा रह सकते हैं। 
                आपको योग करना है, नियम से नित्य की दिनचर्या का पालन करना है और आहार विहार में भी एक सत्यता और उसका नियमित एकसमान पालन करना है। सदैव स्वयं को स्वस्थ और युवा महसूस करना है। शारीरिक श्रम और व्यायाम नियमित कर सकते हैं, तो आप संसार के प्रत्येक सौन्दर्य का रसोपभोग कर सकते हैं।
             मुख्य तथ्य यह है कि जो भी नियमित करें उसमें आपको कदापि यह नहीं लगना चाहिए कि आप असन्तुष्ट है, आप गलत कर रहे हैं। आपको तो सदैव सन्तोष होना चाहिए, दृढ़निश्चयी, एकाग्र एवं आत्मसन्तोषी होना है। 
               श्रम से न घबराएं, बौद्धिकता न त्यागे, नियमितता को सदैव अपनाएं, भाव युवा का हो, दुःख और सुख में समभाव हो, योगाभ्यास नियमित हो, प्राणायाम नियमित हो, खानपान शुद्ध और सन्तुलित हो तो आप अन्तिम श्वास तक चिरयुवा रहकर प्रसन्न और सन्तोषी जीवन जी सकते हैं।
               वस्तुतः हम यह कह सकते हैं कि योग के बल पर आप और हम सब रोग को भगा सकते हैं, स्वास्थ्य को अपना सकते हैं और  पूर्णायु तक चिरयुवा रह सकते हैं। इसके लिए करना है बस नियमित योगाभ्यास, दृढ़निश्चय, धैर्य और जो करें उसे पूर्ण समर्पण एवं पूर्ण मनोयोग से पूर्ण एकाग्रता के संग करें। तभी आप स्वयं तो चिरयुवा बनेंगे ही और निश्चित रूप से दूजों को भी युवा बनने के प्रेरणा स्रोत बनेंगे। 

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