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सोमवार, मई 24, 2010

कुण्‍डली और नेत्र रोग- सत्‍यज्ञ



आप क्या सभी को ज्ञात है कि नेत्र कितने अनमोल हैं। नेत्रविहीन जीवन तो अन्धकारमय है। नेत्र ठीक हैं तो सब कुछ सही रहता है। आप अपनी कुण्डली से यह जान सकते हैं कि आपको नेत्र रोग से कष्ट होगा या नहीं। इस लेख में नेत्र रोग संबंधी योगों की चर्चा करेंगे जिससे आप अनमोल नेत्र की सुरक्षा का ध्यान रख सकें। आईए नेत्र रोग संबंधी योगों को जानें जोकि यहां दे रहे हैं।
नेत्र रोग संबंधी अनुभूत योग
1. किसी जातक की कुण्डली में आठवें भाव में शुक्र हो तो  उसकी दायीं आंख में रोग होता है।
2. चन्द्र व सूर्य बारहवें हो एवं उस पर शुभग्रह की दृष्टि न पड़े य सिंह राशि का शनि या शुक्र लग्न भाव में बैठा हो तो जातक मध्य अवस्था में अन्धा हो जाता है।
3. जातक की कुण्डली में द्वितीयेश एवं द्वादशेश शनि व मंगल से युत हों तो नेत्र में रोग होता है।
4. जन्म कुण्डली में पहले या आठवें भाव में शुक्र हो और सूर्य, मंगल व शनि से दृष्ट हो तो जातक नेत्र रोग से पीड़ित होता है।
5. शयनावस्था वाला मंगल लग्न में हो तो नेत्र रोग होता है।
6. शुक्र से छठे, आठवें या बारहवें भाव में द्वितीयेश व व्ययेश स्थित हों तो जातक नेत्र रोगी होता है।
7. पाचवें भाव में स्थित सूर्य पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक के नेत्र निस्तेज होते हैं।
8. चन्द्र-शुक्र की युति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो जातक रतौंधी रोग से पीड़ित होता है।
9. मंगल या चन्द्र लग्न में स्थित होकर गुरु व शुक्र से दृष्ट हो या इनमें से कोई एक ग्रह देखता हो तो जातक काना होता है।
10. सिंह राशि का चन्द्र सप्तम भाव में मंगल से दृष्ट हो या सूर्य सप्तम भाव में मंगल से दृष्ट हो तो जातक काना होता है।
11. चन्द्र-शुक्र की युति सप्तम या बारहवें भाव में हो तो जातक बायीं आंख से काना होता है।
12. द्वादश भाव में मंगल हो तो जातक के बायीं आंख में चोट लगती है और दूसरे भाव में शनि स्थित हो तो दायीं आंख में चोट लगती है।
13. लग्नेश व धनेश छठे, आठवें एवं बारहवें भाव में हों तथा लग्न में सिंह राशि में सूर्य-चन्द्र की युति होकर शनि से दृष्ट हो तो जातक के नेत्रों में ज्योति नहीं होती है।
14. लग्नेश सूर्य व शुक्र से युत होकर छठे, आठवें, बारहवें भाव में स्थित हो तथा द्वितीयेश व द्वादशेश लग्नेश सूर्य एवं शुक्र से युत होकर त्रिक भाव में स्थित हो तो जातक जन्म से अन्धा होता है।
15. शुक्र-लग्नेश-द्वितीयेश-व्ययेश की युति त्रिक भाव में हो तो जातक अन्धा होता है।
16. चन्द्र-मंगल की युति त्रिक भाव में हो तो जातक गिरने से अन्धा होता है।
17. चन्द्र-गुरु की युति त्रिक भाव में हो तो जातक 30वर्ष के बाद अन्धा होता है।
18. चन्द्र-सूर्य की युति तीसरे या पहले, चौथे, सातवें व दसवें भाव में हो अथवा पापग्रह की राशि में स्थित मंगल केन्द्र में हो तो जातक नेत्र रोग से अन्धा होता है।
19. मकर या कुम्भ राशि का सूर्य सातवें हो या शुभग्रह त्रिक भाव में हों और क्रूर ग्रह सूर्य, मंगल व शनि से दृष्ट होंतो जातक अन्धा होता है।
20. चौथे व पांचवे भाव में पापग्रह हों या पापग्रह से दृष्ट चन्द्र त्रिक भाव में हो तो जातक 25वर्ष के बाद काना हो जाता है।
21. चन्द्र बारहवें, शनि दूसरे व सूर्य आठवें हो तो जातक नेत्रहीन होता है।
22. छठे चन्द्र, आठवें सूर्य व बारहवें मंगल हो तो जातक वात व कफ रोग के कारण अन्धा होता है।
एक महिला की कुण्डली दे रहे हैं जो इस प्रकार है-इस कुण्डली में द्वादशेश द्वितीय भाव में बुध व सूर्य-शनि से दृष्ट है और द्वादश भाव में राहु स्थित है। स्पष्ट है कि दायीं आंख अधिक प्रभावित है जिससे उसमें रोग के कारण ज्योति नहीं है और बायीं   आंख में रोग के कारण कष्ट है। 

इस प्रकार आप किसी भी आंख में इन योगों को ढूंढकर यह जान सकते हैं कि आंख में रोग होगा या नहीं।


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