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मंगलवार, मई 18, 2010

गण्डमूल इतने अशुभ क्यों ? (भाग-एक) लेखक : पं. ज्ञानेश्वर



यह जान लें कि सन्धिकाल सदैव से ही अशुभ, हानिकारक, कष्टदायी व असमंजस युक्त होता है। सन्धि से तात्पर्य एक की समाप्ति और दूसरे का प्रारम्भ, अब चाहे वह समय हो या स्थान हो या परिस्थिति हो। ऋतुओं की सन्धि रोगकारक होती है। ज्योतिष में अनेक प्रकार की सन्धि है, जैसे सूर्य संक्रान्ति, नक्षत्र सन्धि, राशि सन्धि, तिथि सन्धि, लग्न सन्धि, भाव सन्धि, दशा सन्धि आदि। इन सन्धियों में जन्मे जातक को भारी विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। सन्धिकाल में शुभकार्य, विवाह, यात्रा आदि वर्जित हैं। यहां उस सन्धि का विचार करेंगे जिसमें दो प्रकार की सन्धियां एक साथ आ जाती हैं-नक्षत्र व राशि सन्धि।
राशि व नक्षत्र रूपी संयुक्त सन्धि
आपको यह जान लें कि राशियों में 27नक्षत्रों का वितरण करने के लिए भचक्र को 120अंश के तीन तृतीयांशों में विभाजित किया गया है। एक तृतीयांश में 9नक्षत्र, 36चरण तथा 4राशियां हैं। तीनों तृतीयाशों में 9-9 नक्षत्रों की आवृत्ति नक्षत्र स्वामी के अनुसार समान रूप से है। प्रत्येक तृतीयांश केतु के नक्षत्र क्रमशः पहला अश्विनी, दसवां मघा तथा उन्नीसवां मूला से प्रारम्भ होकर बुध के नक्षत्र क्रमशः नौवां आश्लेषा, अठाहरवां ज्येष्ठा एवं सत्ताईसवां रेवती पर समाप्त होता है। 
इसी प्रकार राशियों के वितरण पर ध्यान दें तो ज्ञात होगा कि प्रत्येक तृतीयांश अग्नि तत्त्व राशि क्रमशः मेष, सिंह तथा धनु से प्रारम्भ होकर जल तत्त्व राशि क्रमशः कर्क, वृश्चिक तथा मीन पर समाप्त होता है। 0 अंश, 120 अंश तथा 240 अंश को इसी आधार पर जन्म कुण्डली में भी त्रिकोणों की संज्ञा प्रदान की गई है। ये बिन्दु क्रमशः लग्न, पंचम तथा नवम भाव के प्रारम्भ माने जाते हैं। ये तीन बिन्दु ऐसे स्थानों पर हैं जहां नक्षत्र व राशि दोनों एक साथ समाप्त एवं प्रारम्भ होते हैं अर्थात्‌ ये बिन्दु नक्षत्र एवं राशि के संयुक्त सन्धि स्थल है।
सन्धि स्थल अशुभ होते हैं!
पहला सन्धि स्थल 0 अंश पर रेवती(मीन) समाप्त होकर अश्विनी(मेष)प्रारम्भ होता है।
दूसरा सन्धि स्थल 120 अंश पर आश्लेषा(कर्क) समाप्त होकर मघा(सिंह)प्रारम्भ होता है।
तीसरा सन्धि स्थल 240 अंश पर ज्येष्ठा(वृश्चिक) समाप्त होकर मूला(धनु)प्रारम्भ होता है। 
उपरोक्त समाप्त होने वाले नक्षत्रों रेवती, आश्लेषा एवं ज्येष्ठा का स्वामी बुध तथा तीनों राशियों मीन, कर्क एवं वृश्चिक जल तत्त्व प्रधान है।
 इसी प्रकार प्रारम्भ होने वाले नक्षत्रों अश्विनी, मघा एवं मूला का स्वामी केतु है तथा तीनों राशियों मेष, सिंह एवं धनु अग्नि तत्त्व प्रधान है। 
बुध के नक्षत्र रजोगुणी एवं केतु के नक्षत्र तमोगुणी हैं। ये बिन्दु राशि के नुसार अग्नि व जल के सन्धि स्थल तथा नक्षत्रानुसार रज और तम के। इस मूलाधार के कारण ही ये सन्धि स्थल अशान्त, विस्फोटक, क्षोभपूर्ण एवं तूफानी होने के कारण अशुभ माने जाते हैं। वस्तुतः स्पष्ट है कि नक्षत्रों के तीन युग्म  रेवती-अश्विनी, आश्लेषा-मघा एवं ज्येष्ठा-मूला मूल संज्ञक कहलाते हैं। इन तीनों युग्मों में प्रत्येक का मान 26अंश40कला है।
बड़े व छोटे मूल क्या हैं?
मूला, ज्येष्ठा व आश्लेषा बड़े मूल कहलाते हैं तथा अश्विनी, रेवती व मघा छोटे मूल कहे जाते हैं। 
बड़े मूलों में जन्मे जातक के लिए जन्म के 27दिन बाद चन्द्रमा जब उसी नक्षत्र में आता है तब मूल शान्ति कराई जाती है। तब तक पिता बालक का मुख नहीं देखता है। छोटे मूलों की शान्ति दसवें दिन या 19वें दिन जब उसी स्वामी का दूसरा या तीसरा नक्षत्र अनुजन्म या त्रिजन्म आता है तब कराई जाती है। २७ वर्ष के बाद इसकी  शांति की सभी सम्भावनाएं शेष नहीं बचतीं हैं, इसलिए इससे पूर्व करा लेनी चाहिए!
गण्डान्त मूल और उसका फल
सन्धि के सर्वाधिक निकट गण्ड मूलों की अशुभता में और भी वृद्धि हो जाती है। 0, 120 एवं 240अंश तो अत्यन्त संवेदनशील  बिन्दु हैं, क्योंकि वहीं जल व अग्नि का वास्तविक मिलन होता है। ऐसे समय में जातक का उत्पन्न होना अत्यन्त ही दुविधाजनक होता है। ऐसा बालक या तो जीता ही नहीं, यदि जी जाए तो फिर विशेष रूप से यशस्वी होता है, लेकिन माता-पिता के लिए अत्यन्त कष्टकारी होता है। सन्धि के अत्यन्त निकट वाले भाग को गण्डान्त मूल की संज्ञा दी गई है। प्रथम युग्म में मीन(रेवती के चतुर्थ चरण में)-मेष(अश्विनी के प्रथम  चरण में), द्वितीय युग्म में कर्क(आश्लेषा के चतुर्थ चरण में)-सिंह(मघा के प्रथम चरण में) एवं तृतीय युग्म में वृश्चिक(ज्येष्ठा के चतुर्थ चरण में)-धनु(मूला के प्रथम चरण में)।
गण्डमूल रेवती के प्रथम चरण राज्य सम्मान, द्वितीय चरण में राज्य का सुख, तृतीय चरण में सुखदायी एवं चतुर्थ चरण में  अनेक कष्ट होते हैं। गण्डमूल आश्लेषा के प्रथम चरण राज्य सुख, द्वितीय चरण में धनहानि, तृतीय चरण में मातृहानि एवं चतुर्थ चरण में  पितृ हानि होती है। गण्डमूल ज्येष्ठा के प्रथम चरण ज्येष्ठ भ्राता को कष्ट, द्वितीय चरण में अनुज भ्राता को कष्ट, तृतीय चरण में माता को कष्ट एवं चतुर्थ चरण में स्व की हानि होती है। बुध के तीनों नक्षत्र के प्रत्येक चरण का फल बता दिया है। शेष चर्चा कल 19.5.10 में करेंगे।(क्रमशः)

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