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सोमवार, जनवरी 11, 2010

आचरण-ज्ञानेश्वर


एक व्यापारी ने बहुत धन कमाया। उसे अपनी सम्पन्नता पर इतना गर्व था कि वह सभी से ऐंठा करता था और दुर्व्यवहार करता था। फल यह हुआ कि उसके लड़के भी अहंकारी हो गए और उदण्डी बन गए। वे सबसे दुर्व्यवहार करते और अन्ततः पिता व पुत्रों में भी ठनने लगी। घर नरक बन गया। व्यापारी दुःखी रहने लगा। वह एक महात्मा के पास गया और बोला मुझे दीक्षा देकर सन्यासी बना दो। मैं अब घर नहीं जाना चाहता। महात्मा ने कहा वत्स तुम घर जाओं अभी सन्यासी बनने का समय नहीं आया है। एक बात याद रखो तुम जैसा दूसरों से चाहते हो वैसा ही आचरण उनसे करो। सब ठीक हो जाएगा। घर नरक नहीं स्वर्ग बन जाएगा। व्यापारी घर लौट आया और उसने सबसे अच्छा आचरण प्रारम्भ कर दिया। धीरे-धीरे पिता में परिवर्तन देखकर उसके परिवार में भी परिवर्तन आ गया। सब सुधर गए और घर नरक की बजाए स्वर्ग बन गया। दूजों से जैसा जिसको चाहिए उसे उनसे वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। दुर्व्यवहार से कोई किसी को जीत नहीं सकता है। सुआचरण सदैव कार्य बनाता है और सर्वप्रिय बनाता है उस व्यापारी की तरह जिसने सुआचरण से सबका मन मोह लिया और घर को स्वर्ग बना लिया।


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