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बुधवार, जुलाई 29, 2009

अनुभूत ज्ञान सूत्र

 भाव
'भाव प्रधान है। भाव की महत्ता सर्वोपरि है। जो जैसी भावना रखता है वह उसके कार्य में परिलक्षित हो उठती है। जो जितनी जल्दी निज और दूजे के भाव को समझ लेता है वह उतनी जल्दी सुकार्य में रत हो उठता है। भाव शून्यता छोड़कर समर्पण भाव से कर्मरत्‌ होना ही सफलता का सोपान है।' -ज्ञानेश्वर आत्मबल
' शरीर की चेतनता आत्मा के कारण है। जो ध्यान लगाता है और अपना आत्मविश्लेषण नित्य करता है, उसका आत्मबल अवश्य बढ़ता है। आत्मबली ही कुछ विशेष करते हैं और यशस्वी बन समाज का हित करते हैं। आत्मबल के बिना कोई भी कुछ नहीं कर पाता है। आत्मबल भटकाव से बचाता है।'  -ज्ञानेश्वर


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